संदेश

अयोध्या का सच

क्या है अयोध्या का सच कौन  जाने सब मस्त है मंदिर  की धुन मे किसको सुध आम जनता की नेता कहते नहीं बनेगा संत कहते बनेगा राम जी का ठिकाना नहीं क्या होगा राम जी का सब अपनी रोटी सेकते  है, अयोध्या फिर सुर्खी में है संत मंदिर बनवा ही लेंगे जनता जी किसी की सुध नहीं है सब राम में मस्त है चनाव आ गए है अब  संतो को याद आई की मंदिर बनना है सब राम का मंदिर चाहते है पर जिन के पास घर नहीं है उनके घर कैसे बने ये नहीं कोई सोचता क्या होगा राम का मंदिर बना कर जब उसके भक्तो के पास ही रहने को छत नहीं

राखी का बंधन

राखी का त्यौहार लगता है प्यारा भाई- बहन का प्यार होता है सच्चा सबसे सच्चा रिश्ता होता है भाई - बहन का भाई करता है हर समय बहन की रक्षा हर साल आता है  यह त्यौहार और लता है खुशिया अपार सरहद पर वीर जवानो के लिए राखी  का बंधन होता है अपने देश के सरहदों को बचने के लिए राखी है पावन  पुनीत आओ संकल्प ले हम इस राखी पर बचायेंगे हर बहना की लाज 

पत्थरों का शहर

पत्थरों  के इस शहर में किस  से दिल  लगाऊ हर कोई लगाये  है चहेरे कोई नहीं लगता है अपना  किस से दर्द बताऊ पत्थरों के शहर में न दिलहै न जज्बात, हर कोई लगता है झूठा कैसे  हाल बताऊ सब कोई हँसते है हम पर का से दर्द बताऊ पत्थरों के शहर में हर कोई हेरान है

ये कैसी स्वतंत्रता

 फिर आया १५ अगस्त  क्या  लाया एक और दिन न याद आते है शहीद  और न  उनका बलिदान बस याद आता है लडू और    कुछ  नहीं  क्या  यही रह गयी है  स्वतंत्रता ये कैसी  स्वतंत्रता  है? बच्चो  को क्या पता क्या  होता है बलिदान क्या है देश भावना एक  दिन मना लेने  से हो  जायेगा   ये दिन  पूरा फिर हो जायेंगे हम गुलाम और फिर कैसी  स्वतंत्रता और क्या इस दिन का  काम 

सावन में प्रेम की की बूंदे

सावन में   जब गिरती है बूँद तो  भीग जाता है  तन मन और नाचने लगता है, ऐसा  लगता है  हर तरफ छाया है प्रेम  खुमार और सभी मस्त है सावन की   फुहारों में, हर फूल कली  कह रही है सावन में भीगने का मन करता है प्यार का  अहसास होता है सावन में हर कोई खुश है सावन की बूंदों में नदी सुमंद्र  से   मिली सावन में   बादल   मिले बादलो से ऐसा लगा दो  प्रेमी मिल रहे  इस  सावन में  

एक युग पुरुष

था सच्चा बेटा इस धरती का कर गया बड़े वो जिसके आगे दुनिया झुकती था उसका नाम विवेकानन्द जीना उसने है सिखलाया वरना  हम क्या क्या करते अपने लिए  तो सब जीते है पर जीना आये  दूसरो  काम था नाज जिसे अपनी धरती पर कर गया संसार  नाम वो है सबमे साहस  मानवता का  सिखला गया साहस का पाठ वो, ना  जात्ती पाती न उच नीच सब है बराबर इस  जहा में ऐसा पाठ  पढ़ाया  उसने देशप्रेम की ललक उठे सिखलाया की  कैसे हो नए समाज का सर्जन यहाँ काटो पर चलकर  भी उसने कर  दिया गर्व  से नाम अमर हे नाज हर भारतवासी को   क्यों न होते आब विवेकानंद छोटी सी आयु में ही कर गए वो नाम अमर अब हम सबकी है बारी कर जाये एक नए समाज का निर्माण यहाँ

कौन है वो

कौन है वो जिसका है इंतजार  खड़ा दरवाजे पर कौन किसकी है आहट दबे पाँव कोई आ रहा  है हुई  थोड़ी  सी हलचल आ गया  वो ये तो कोई अजीब सा इन्सान है किसे लेने  आया है  एक सांस टूटी और ले गया वो अजीब इन्सान एक ज्योति और छोड़ गया वो निर्जीव शरीर किसके लिए सिर्फ रोने के लिए एक मलाल रहा कुछ न कर पाए हम इस जिन्दगी में बेकार हो गया जीवन व्यर्थ की बातो में  अब  एक आस   आयेंगे फिर से इस जहा में कुछ के तो आसूं पूछ पाएंगे हम