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"साहित्य साथी मेरा" दमयंती जोशी

मिला साथ दीदी का, लेखनी में आया निखार, हर मोड़ पर दिया उन्होंने, स्नेह भरा उपहार। राजश्री परिवार से जुड़कर, पाया सुंदर साथ, दीदी के स्नेह-सानिध्य ने, रोशन की मेरी राह। मेरी कविता की हर कमी को, दीदी ने पहचान, प्रेरणा देकर हर पल मुझको, बढ़ाया मेरा मान। दीदी मेरी प्यारी-दुलारी, बातें मन को भातीं, उनकी मीठी सीख और बातें, नई दिशा दिखातीं। हर रचना में उनका स्नेह, बनकर रहता आधार, उनके आशीष से महकता, मेरा साहित्य संसार। राजश्री परिवार यूँ ही, सदा बढ़ाता रहे सम्मान, दीदी का आशीर्वाद मिले, यही है मेरी अरमान। गरिमा लखनवी

छोड़ दीजिए

  ज़िंदगी में कोई काम ऐसा हो, जो आपको अच्छा न लगे, उसे छोड़ दीजिए। किसी का साथ दिल को रास न आए, तो ऐसे रिश्ते को भी छोड़ दीजिए। किसी चीज़ के पीछे यूँ मत भागिए, जो वक्त पर मिलना हो, उसे वक्त पर छोड़ दीजिए। कोई काम आपका बन नहीं रहा हो, तो उसे भी किस्मत पर छोड़ दीजिए। जो आपको मिलना होगा, मिलकर रहेगा, इसलिए हर बात की फिक्र करना छोड़ दीजिए। दूसरों की चिंता में अपनी ज़िंदगी न भूलिए, अपने लिए भी थोड़ा जीना सीख लीजिए। जो आपके साथ चले, उसका साथ निभाइए, जो रास्ते में रुक जाए, उसे छोड़ दीजिए। हर शिकायत का हिसाब रखना छोड़ दीजिए, दिल में बोझ बनाकर कुछ भी मत रखिए। सबके दुख को अपना समझना छोड़ दीजिए, हर किसी का दर्द अपने दिल में न रखिए। ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, जो बुरा है, उसे वहीं छोड़ दीजिए। जिनसे भी मिलें, उनकी कमियाँ वहीं छोड़ आइए, हर बात को दिल से लगाना छोड़ दीजिए। ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है, इसे यूँ न गँवाइए, जो सुकून छीन ले—उसे बस छोड़ दीजिए। — गरिमा लखनवी