संदेश

ऐ दोस्त

बेवजह क्यों मुस्करा रहे हो तुम, किसकी राहों में अब जा रहे हो तुम। हमसे रूठे हो या कोई और सबब है, बिना बताए क्यूँ दूर जा रहे हो तुम। हमने समझा था अपना तुमको ही हमेशा, फिर भी बेगाना हमें बना रहे हो तुम। हर शाम तुम्हारे साथ गुजरनी थी जो, उस वादे से भी मुँह मोड़ जा रहे हो तुम। कितने सपनों की नींव रखी थी हमने, एक भी सपना पूरा न कर सके तुम। ऐ दोस्त, तुम ही जिंदगी के हसीन पल हो, फिर क्यों किसी और की तरफ झुक रहे हो तुम। बेवजह क्यों मुस्करा रहे हो तुम, आख़िर किसके पास जा रहे हो तुम। — गरिमा लखनवी

प्यार

 दर्द में डूबी हुई आंखें दिखाऊं कैसे, प्यार का आपसे इज़हार छुपाऊं कैसे। मौत आती है मगर कोई तमन्ना लेकर, जिंदगी बोल तुझे जीना सिखाऊं कैसे। रात आती है हमेशा तेरी यादें लेकर, ये बता यादों को इस दिल से मिटाऊं कैसे। मुझको आवाज़ लगाते हैं दुखों के साए ज़िंदगी मैं तुझे खुशियों से सजाऊं कैसे। पांव जकड़े हैं मेरे बेड़ियां मजबूरी की तू ही बतला कि तेरे पास मैं आऊं कैसे गरिमा

प्रेम

  प्रेम को कोई नहीं समझ सका, प्रेम मुरझाने वाला फूल नहीं है। यह शांत नदी है, जो सदा मंद–मंद बहती है। यह हवा का कोमल झोंका है, जो हर मन को शीतल करता है। प्रेम बारिश की बूंदें है, जो तन–मन को भिगोती हैं। प्रेम एक मीठा नशा है, जो राधा को कृष्ण से था। प्रेम है एक पवित्र मंदिर, जहाँ एक है दिया और बाती। प्रेम को समझना कठिन है, प्रेम तो सभी करते हैं। पर इसे निभाते बहुत कम, यही इसकी सच्ची परीक्षा है। प्रेम है गहरा समुंदर, जिसकी थाह कोई न पाए। प्रेम है ऐसी मधुर खुशबू, जो हर दिल को महका जाए। गरिमा लखनवी 

प्रभु कृपा

 प्रभु हम पर कृपा करना, प्रभु हम पर दया करना, हम बालक हैं तेरे, दर्शन की कृपा करना। हम आए हैं द्वार तेरे, चरणों में शीश झुकाने, यदि हो जाए कोई भूल, हमको क्षमा करना। प्रभु हम पर कृपा करना, प्रभु हम पर दया करना, हम आए तेरे दर्शन को, अपना रूप दिखा देना। मांगूँ क्या मैं तुझसे, बस इतनी कृपा रखना, मेरे मन में हर पल तेरी सच्ची भक्ति रखना। प्रभु हम पर कृपा करना, प्रभु हम पर दया करना, यदि राह से भटक जाएँ, सही मार्ग दिखा देना। अपनी कृपा सदा रखना, अपनी कृपा सदा रखना, प्रभु हम पर दया करना, प्रभु हम पर कृपा करना।

गणतंत्र दिवस

 गणतंत्र दिवस की सुबह आई है, हर चेहरे पर खुशियाँ छाई हैं। अधिकार हमें इसी दिन मिले, जिनसे सपनों को उड़ान मिली है। नई उम्मीद, नया पैगाम लाया, आगे बढ़ने का पथ दिखाया। देश हमारा करे तरक्की, यही एहसास दिलाता है। संविधान का करें हम सम्मान, हर दिल में यही भावना जगाता है। हाथ थामकर एक-दूजे का, आगे कदम बढ़ाना है। वीरों के संघर्ष, उनके बलिदान, न कभी हम भूल पाएँगे। हँसी-खुशी और गर्व के संग, गणतंत्र दिवस मनाएँगे।

सुभाष को नमन

  मेरी लेखनी का आज उनको प्रणाम, देशप्रेम निभाया जिसने बिना थके, बिना विराम। आज मैं उनको हृदय से याद करती हूँ, जिन्हें सारा संसार सुभाष कहता है। देशभक्ति का वो अद्भुत मतवाला, मातृभूमि की रक्षा का सच्चा रखवाला। सूझबूझ और कूटनीति से क्रांति जलाई, युवाओं के मन में मशाल सदा जगाई। इतिहास नया रच डाला था उसने, अंग्रेजों की नींद उड़ा डाली थी। आजादी की मजबूत नींव रखकर, जन-जन में चेतना भर डाली थी। आज जंजीरें टूटी हैं पर खतरा बाकी है, अराजकता और आतंक अब भी साथी है। आओ सुभाष के पथ पर हम चलें, आजाद हिन्द की भावना फिर से बलें। हे सुभाष, जन्मदिवस पर नमन स्वीकारो, माँ भारती के दुख हरने फिर से पधारो।। गरिमा लखनवी

बसंत पंचमी

  पीली चुनर ओढ़े आई ज्ञान की देवी, सूरज ने आंखें खोली, फिज़ा महक उठी सेवी। मौसम ने ली है आज नई अंगड़ाई, सरसों के खेतों में पीली चादर छाई। मां सरस्वती की कृपा से मिटे अज्ञान अंधकार, ज्ञान, बुद्धि और विवेक का मिले अपार उपहार। कोयल की कूक से बगिया मुस्काई, बसंत पंचमी संग खुशियों की बहार आई। यह पर्व बच्चों को लगता सबसे प्यारा, मां सरस्वती से जुड़ा हर मन का सहारा। मां का आशीर्वाद मिले, यही ध्येय हमारा, ज्ञान-पथ पर बढ़े जीवन सारा। मां, तू ही चेतन मन में ऊर्जा भरती है, तेरी कृपा से हर सोच निखरती है। बरसती रहे सदा तेरी कृपा अपार, हम सबका हो जीवन उद्धार। चहुँ ओर पीली फिज़ा मन को भाए, मां सरस्वती का अभिनंदन गाए। उनके चरणों में वंदन करें, कोटि-कोटि प्रणाम अर्पण करें। बसंत पंचमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। — गरिमा लखनवी