संदेश

माँ सिद्धिदात्री

लाल चुनरिया ओढ़कर मैया, कमल पर विराजती है, जो भी भक्त करे तेरी पूजा, मनोकामना पूर्ण करती है। अष्ट सिद्धि नव निधि की दाता, रखना हाथ दया का माँ, शंख, चक्र और गदा धारण कर, सिद्धियाँ देती हो माँ। मन, बुद्धि और विद्या देना, ज्ञान का दीप जलाना माँ, भटके हुए हम भक्तों को, सही राह दिखाना माँ। जो तेरी पूजा नित दिन करता, उसके कष्ट मिटाती हो, तेरे द्वार से कोई खाली न जाए, सबकी झोली भरती हो। तेरी महिमा अपरंपार माँ, तेरी लीला न्यारी है, तेरे चरणों में शीश झुकाएँ, माँ तू जग से प्यारी है। जय माँ सिद्धिदात्री!  गरिमा लखनवी

लाल बहादुर शास्त्री

दो अक्टूबर उन्नीस सौ चार को, मुगलसराय में जन्म हुआ। माता रामदुलारी, पिता शारदा प्रसाद, घर में खुशियों का आगमन हुआ। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि पाई, स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाई। असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में, देश की आजादी की अलख जगाई। नौ जून उन्नीस सौ चौंसठ को, भारत के प्रधानमंत्री बने। सादगी और ईमानदारी के प्रतीक, जन-जन के दिलों में बसने लगे। पैंसठ के भारत-पाक युद्ध में, भारत ने विजय पताका फहराई। “जय जवान, जय किसान” का नारा देकर, देश में नई चेतना जगाई। हरित क्रांति को बढ़ावा दिया, श्वेत क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया। देशहित में उपवास की पहल करके, त्याग और समर्पण का संदेश दिया। ग्यारह जनवरी उन्नीस सौ छियासठ को, ताशकंद में उनका निधन हुआ। उनके निधन से जुड़ी अनसुलझी चर्चाओं ने, आज तक मन में प्रश्न खड़ा किया। मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित, ऐसे महापुरुष को मेरा शत-शत नमन। देशभक्ति, सादगी और सत्य के प्रतीक, शास्त्री जी को कोटि-कोटि वंदन। — गरिमा लखनवी

माँ ब्रह्मचारिणी की महिमा

माँ की महिमा निराली है, तेरी शक्ति जग से न्यारी है। तेरी महिमा वेदों ने गाई, तेरे चरणों में दुनिया समाई। तप और आचरण का पाठ पढ़ाती, त्याग-तपस्या की मूरत कहलाती। धैर्य और संयम का ज्ञान सिखाती, भक्तों के जीवन में ज्योत जलाती। जो भी तेरा दर्शन पाए, तेरे चरणों में शीश नवाए। ज्ञान और तप की तुम हो दाता, भक्तों के कष्टों को हरने वाली माता। तेरे दर्शन से शांति मिलती, मन में श्रद्धा की ज्योति खिलती। भवसागर से पार उतारो, मैया! सब पर कृपा बरसाओ। जय माँ ब्रह्मचारिणी!  — गरिमा लखनवी

"साहित्य साथी मेरा" दमयंती जोशी

मिला साथ दीदी का, लेखनी में आया निखार, हर मोड़ पर दिया उन्होंने, स्नेह भरा उपहार। राजश्री परिवार से जुड़कर, पाया सुंदर साथ, दीदी के स्नेह-सानिध्य ने, रोशन की मेरी राह। मेरी कविता की हर कमी को, दीदी ने पहचान, प्रेरणा देकर हर पल मुझको, बढ़ाया मेरा मान। दीदी मेरी प्यारी-दुलारी, बातें मन को भातीं, उनकी मीठी सीख और बातें, नई दिशा दिखातीं। हर रचना में उनका स्नेह, बनकर रहता आधार, उनके आशीष से महकता, मेरा साहित्य संसार। राजश्री परिवार यूँ ही, सदा बढ़ाता रहे सम्मान, दीदी का आशीर्वाद मिले, यही है मेरी अरमान। गरिमा लखनवी

छोड़ दीजिए

  ज़िंदगी में कोई काम ऐसा हो, जो आपको अच्छा न लगे, उसे छोड़ दीजिए। किसी का साथ दिल को रास न आए, तो ऐसे रिश्ते को भी छोड़ दीजिए। किसी चीज़ के पीछे यूँ मत भागिए, जो वक्त पर मिलना हो, उसे वक्त पर छोड़ दीजिए। कोई काम आपका बन नहीं रहा हो, तो उसे भी किस्मत पर छोड़ दीजिए। जो आपको मिलना होगा, मिलकर रहेगा, इसलिए हर बात की फिक्र करना छोड़ दीजिए। दूसरों की चिंता में अपनी ज़िंदगी न भूलिए, अपने लिए भी थोड़ा जीना सीख लीजिए। जो आपके साथ चले, उसका साथ निभाइए, जो रास्ते में रुक जाए, उसे छोड़ दीजिए। हर शिकायत का हिसाब रखना छोड़ दीजिए, दिल में बोझ बनाकर कुछ भी मत रखिए। सबके दुख को अपना समझना छोड़ दीजिए, हर किसी का दर्द अपने दिल में न रखिए। ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, जो बुरा है, उसे वहीं छोड़ दीजिए। जिनसे भी मिलें, उनकी कमियाँ वहीं छोड़ आइए, हर बात को दिल से लगाना छोड़ दीजिए। ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है, इसे यूँ न गँवाइए, जो सुकून छीन ले—उसे बस छोड़ दीजिए। — गरिमा लखनवी

ऐसा देश नहीं चाहिए

  भ्रष्टाचार हो इस देश में, ऐसा देश नहीं चाहिए, नारी की हो जहाँ बेइज्जती, ऐसा देश नहीं चाहिए। बड़े-बुजुर्गों का जहाँ मान-सम्मान न हो, छोटों के प्रति जहाँ प्यार न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ धन-दौलत की ही पूजा हो, इंसानियत की कोई कदर न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ धर्म के नाम पर आपस में विवाद हो, भाई-भाई का जहाँ दुश्मन हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ रिश्तों में हर पल तकरार हो, सास-बहू में भी प्रेम न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ गरीबों के हक पर कोई डाका डाले, और स्वार्थ में अपने ही घर भर डाले, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ अमीरी-गरीबी में भेदभाव की दीवार हो, हर इंसान के बीच समानता और अधिकार हो। जहाँ प्रेम, भाईचारा और सद्भावना का वास हो, हर चेहरे पर मुस्कान और दिल में विश्वास हो। जहाँ अमन-चैन, सुख-शांति का बसेरा हो, हर नागरिक के जीवन में उजियारा हो। ऐसा देश नहीं, ऐसा भारत चाहिए, जहाँ हर दिल में प्रेम और हर मन में सम्मान चाहिए। — गरिमा लखनवी

पितरों को नमन

  पितर हमारे पूजनीय होते हैं, हम श्रद्धा से उनकी वंदना करते हैं। वर्ष में एक समय आता है, जब पितरों को याद किया जाता है। पर मन में एक प्रश्न उठता है, जीते जी जिसका सम्मान न कर सके, जिसे अपना प्यार न दे सके, मरने के बाद प्रेम जताने से क्या होगा? पितरों को देवतुल्य माना जाता है, उनका आशीष जीवन संवारता है। मान्यता है, आत्मा नया रूप धारण करती है, फिर भी उनकी स्मृतियाँ हमारे साथ रहती हैं। पितर ही हमारे जीवन का आधार हैं, उनके बिना घर सूना-सूना सा लगता है। पितरों के पुण्य प्रताप से कीर्ति मिलती है, उनके आशीष से सुख-समृद्धि मिलती है। आओ, जीते जी अपनों का सम्मान करें, प्रेम और स्नेह से उनका सत्कार करें। पितरों की स्मृति को हृदय में सदा बसाएँ, उनके संस्कारों को जीवन में अपनाएँ। सभी पितरों को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम, श्रद्धा-सुमन अर्पित कर शत-शत नमन। गरिमा लखनवी