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इश्क हो गया है

आँख से आँख लड़ी है, दिल से दिल मिल गया है, क्या कहें, कैसे कहें—हमको इश्क हो गया है। क्या कहें, कैसे कहें—हमको इश्क हो गया है। दिन का चैन उड़ा है, रातों की नींद उड़ी है, तेरी यादों में अब हर एक घड़ी ही कटी है, सपनों में भी तेरा चेहरा नजर आता है, दिल ये हर पल बस तेरा ही गीत गाता है। आँख से आँख लड़ी है… हर पल मुझको तेरी याद सताती है, पल-पल ये आँखें भीग सी जाती हैं, तेरा जाना दिल को बहुत रुलाता है, तेरे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। क्या कहें, कैसे कहें—हमको इश्क हो गया है… तेरे ख्यालों में ही दिन-रात गुजरते हैं, दिल के जज़्बात अब लफ्ज़ों में उतरते हैं, तू जो मिले तो ये दिल मुस्कुरा जाएगा, तेरे बिना ये सफर अधूरा रह जाएगा। आँख से आँख लड़ी है, दिल से दिल मिल गया है, क्या कहें, कैसे कहें—हमको इश्क हो गया है… गरिमा लखनवी 

पतझड़ के सूखे पत्ते

  पतझड़ के सूखे पत्तों सी हमारी यह जिंदगानी है, टूटकर शाखों से गिरना जैसे इसकी कहानी है। सूखे पत्ते गिरते जाते, चुपचाप बिखर जाते हैं, वैसे ही कुछ रिश्ते भी समय के संग खो जाते हैं। पर हर पतझड़ के बाद यहाँ फिर से बहार आती है, सूनी डाली पर हरियाली नई उमंग जगाती है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है, टूटकर फिर जुड़ जाता है, हर अंत के बाद एक नया सवेरा मुस्काता है।