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ऐसा देश नहीं चाहिए

  भ्रष्टाचार हो इस देश में, ऐसा देश नहीं चाहिए, नारी की हो जहाँ बेइज्जती, ऐसा देश नहीं चाहिए। बड़े-बुजुर्गों का जहाँ मान-सम्मान न हो, छोटों के प्रति जहाँ प्यार न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ धन-दौलत की ही पूजा हो, इंसानियत की कोई कदर न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ धर्म के नाम पर आपस में विवाद हो, भाई-भाई का जहाँ दुश्मन हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ रिश्तों में हर पल तकरार हो, सास-बहू में भी प्रेम न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ गरीबों के हक पर कोई डाका डाले, और स्वार्थ में अपने ही घर भर डाले, ऐसा देश नहीं चाहिए। जहाँ अमीरी-गरीबी में भेदभाव की दीवार हो, हर इंसान के बीच समानता और अधिकार हो। जहाँ प्रेम, भाईचारा और सद्भावना का वास हो, हर चेहरे पर मुस्कान और दिल में विश्वास हो। जहाँ अमन-चैन, सुख-शांति का बसेरा हो, हर नागरिक के जीवन में उजियारा हो। ऐसा देश नहीं, ऐसा भारत चाहिए, जहाँ हर दिल में प्रेम और हर मन में सम्मान चाहिए। — गरिमा लखनवी

पितरों को नमन

  पितर हमारे पूजनीय होते हैं, हम श्रद्धा से उनकी वंदना करते हैं। वर्ष में एक समय आता है, जब पितरों को याद किया जाता है। पर मन में एक प्रश्न उठता है, जीते जी जिसका सम्मान न कर सके, जिसे अपना प्यार न दे सके, मरने के बाद प्रेम जताने से क्या होगा? पितरों को देवतुल्य माना जाता है, उनका आशीष जीवन संवारता है। मान्यता है, आत्मा नया रूप धारण करती है, फिर भी उनकी स्मृतियाँ हमारे साथ रहती हैं। पितर ही हमारे जीवन का आधार हैं, उनके बिना घर सूना-सूना सा लगता है। पितरों के पुण्य प्रताप से कीर्ति मिलती है, उनके आशीष से सुख-समृद्धि मिलती है। आओ, जीते जी अपनों का सम्मान करें, प्रेम और स्नेह से उनका सत्कार करें। पितरों की स्मृति को हृदय में सदा बसाएँ, उनके संस्कारों को जीवन में अपनाएँ। सभी पितरों को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम, श्रद्धा-सुमन अर्पित कर शत-शत नमन। गरिमा लखनवी

हिन्दी दिवस

हिन्दी की शान निराली है, अपने आप में मतवाली है। संस्कृत संग लाड़ लड़ाती, मधुर-मधुर रस बरसाती है। सुंदर, सरल, सुगम और मीठी, हर दिल को लगती है प्रीति। ओजस्विता का संगम है, हिन्दी में अद्भुत दमखम है। आपस में मैत्री बढ़ाती है, सबको अपना बनाती है। साहित्य-साधना हिन्दी है, कवियों की अभिमान हिन्दी है। किसी भाषा से बैर नहीं, सब भाषाओं से प्यार सही। माँ शारदा की आराधना है, भारत की सच्ची साधना है। राष्ट्र के माथे की बिंदी है, भारत की पहचान हिन्दी है। हर दिशा में इसकी शान है, भारत की हिन्दी ही जान है। हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। गरिमा लखनवी

भारत माता

  भारत माता तेरी जय हो, तेरी गोदी में खेले वीर जवानों की जय हो। संस्कारों की जननी, ममता की मूरत, हे भारत माता, तेरी जय हो, तेरी जय हो। तेरी रक्षा में शीश चढ़ाते, वीर सपूत तेरा मान बढ़ाते। सीमा पर डटकर खड़े जवान, उन वीरों को शत-शत प्रणाम। माँ, कब तक रहेगी बेड़ियों में जकड़ी, कब तक सहती रहेगी पीड़ा ये गहरी? तेरे ही बेटे जब तुझे तार-तार करते हैं, अपने स्वार्थ में माँ का सम्मान भूलते हैं। नदियाँ, पर्वत, खेत और धरती, तेरे ही रूप हैं माँ, ये प्रकृति सुहाती। गंगा-यमुना तेरी पावन धारा, तेरी माटी से जग है प्यारा। तेरी शान में शीश नवाते हैं, कोटि-कोटि वंदन तुझे करते हैं। तेरी आन, बान और शान रहे, सदा तिरंगा आसमान में महान रहे। भारत माता तेरी जय हो, वीर जवानों की सदा जय हो। जन-जन के मन में प्रेम जगाए, भारत माता सदा मुस्कुराए। — गरिमा लखनवी

श्री कृष्ण

  देवकी नंदन, नंद के दुलारे, यशोदा मैया के राजदुलारे। मोर मुकुट सिर, अधरों पर बंसी, मन को भाने वाले गिरधारी। वृंदावन की कुंज गलियों में, गोपियों संग रास रचाने वाले। मुरली की मधुर तान सुनाकर, प्रेम का संदेश सुनाने वाले। असुरों का संहार किया, धर्म की ज्योति जगाने वाले। गीता का पावन ज्ञान सुनाकर, कर्म की राह दिखाने वाले। गोवर्धन पर्वत उठाकर, भक्तों की लाज बचाने वाले। दीन-दुखी के तुम रखवाले, सबके कष्ट मिटाने वाले। तेरी बंसी पर गायें मगन हों, तेरी बंसी पर गोपियाँ मगन हों। तेरी बंसी पर नदियाँ झूमें, तेरी धुन में पवन भी मगन हो। राधा के मन के प्यारे मोहन, प्रेम की गंगा बहाने वाले। जग के पालनहार हो कान्हा, सबके मन को हरषाने वाले। माखन चुराकर हँसी बिखेरी, नटखट रूप दिखाने वाले। हर संकट में साथ निभाकर, भक्तों को गले लगाने वाले। तेरे चरणों में शीश झुकाएँ, जीवन सफल हमारा हो। हे श्री कृष्ण, हे नंदलाला, तुम्हें शत-शत नमन हो। — गरिमा लखनवी