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कारगिल विजय दिवस

 कारगिल के अमर वीरों को शत-शत नमन छब्बीस जुलाई का वह गौरवशाली दिन, जब भारत ने विजय का परचम लहराया था। कारगिल की दुर्गम चोटियों पर, अपने वीरों ने इतिहास रचाया था। बर्फीली वादियों में सीना ताने, दुश्मन से लोहा लेते रहे। माँ भारती की आन-बान की खातिर, हँसते-हँसते प्राण समर्पित करते रहे। कितनी माँओं की गोद सूनी हो गई, कितनी बहनों की राखी रोती रह गई। कितनी नववधुओं का सिंदूर मिट गया, कितने अरमानों की चिता जल गई। जब तिरंगे में लिपटी अर्थियाँ आईं, हर आँगन मौन खड़ा रह गया। पिता का साहस भी टूट गया, माँ का आँचल आँसुओं से भीग गया। पर उन वीरों ने अंतिम साँस तक, भारत माँ का मान बचाया। अपने रक्त की हर बूँद देकर, तिरंगे का गौरव बढ़ाया। ऐसे रणबाँकुरों के चरणों में, मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। उनकी वीर माताओं, बहनों और वीरांगनाओं को, मेरा बारंबार प्रणाम है। आओ आज हम सब मिलकर, यह पावन संकल्प उठाएँ। देश की आन, बान और शान की रक्षा में, अपने कर्तव्य सदा निभाएँ। कारगिल के अमर शहीदों! आपका बलिदान अमर रहेगा। जब-जब तिरंगा नभ में लहराएगा, भारत आपका ऋणी रहेगा। गरिमा लखनवी 

डॉक्टर्स डे

  डॉक्टर कितने महान होते हैं, रोगियों के लिए भगवान होते हैं। हम अपना हर दर्द उन्हें बताते हैं, वे हर पीड़ा की पहचान होते हैं। रोगी को स्वस्थ करना आदत है उनकी, उनकी मुस्कान भी दवा का काम करती है। डॉक्टर प्यार से दो शब्द बोल दें, तो रोगी की आधी पीड़ा दूर हो जाती है। कितनी आस लेकर आते हैं रोगी, और स्वस्थ होकर घर लौट जाते हैं। जटिल से जटिल रोगों का उपचार कर, डॉक्टर जीवन में नई उम्मीद जगाते हैं। पर आज कहीं-कहीं डॉक्टरी एक पेशा बन गई है, कुछ लोग अपना कर्तव्य भूल धन कमाने में लग गए हैं। रोगियों की जान अब सस्ती न समझी जाए, मानवता की लौ सदा जलती रहनी चाहिए। डॉक्टर्स डे पर सभी चिकित्सकों से यही अपेक्षा है मेरी, रोगी को रोगी ही समझें, पैसा कमाने की मशीन नहीं। गरिमा लखनवी