श्री कृष्ण

 

देवकी नंदन, नंद के दुलारे, यशोदा मैया के राजदुलारे।

मोर मुकुट सिर, अधरों पर बंसी, मन को भाने वाले गिरधारी।

वृंदावन की कुंज गलियों में, गोपियों संग रास रचाने वाले।

मुरली की मधुर तान सुनाकर, प्रेम का संदेश सुनाने वाले।

असुरों का संहार किया, धर्म की ज्योति जगाने वाले।

गीता का पावन ज्ञान सुनाकर, कर्म की राह दिखाने वाले।

गोवर्धन पर्वत उठाकर, भक्तों की लाज बचाने वाले।

दीन-दुखी के तुम रखवाले, सबके कष्ट मिटाने वाले।

तेरी बंसी पर गायें मगन हों, तेरी बंसी पर गोपियाँ मगन हों।

तेरी बंसी पर नदियाँ झूमें, तेरी धुन में पवन भी मगन हो।

राधा के मन के प्यारे मोहन, प्रेम की गंगा बहाने वाले।

जग के पालनहार हो कान्हा, सबके मन को हरषाने वाले।

माखन चुराकर हँसी बिखेरी, नटखट रूप दिखाने वाले।

हर संकट में साथ निभाकर, भक्तों को गले लगाने वाले।

तेरे चरणों में शीश झुकाएँ, जीवन सफल हमारा हो।

हे श्री कृष्ण, हे नंदलाला, तुम्हें शत-शत नमन हो।

— गरिमा लखनवी

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