मुंशी प्रेमचंद जी
आप आज होते तो कितना सुखद एहसास होता,
साहित्य का हर आँगन फिर से आपके पास होता।
जन्म आपका हिंदी जगत के लिए वरदान बना,
लेखन से मानवता का सुंदर अभियान बना।
"पूस की रात" हो या "गोदान" की अमर कहानी,
हर रचना में झलकी जन-जन के जीवन की निशानी।
सही-गलत का भेद आपने सरल शब्दों में बताया,
मानवता का सच्चा पथ दुनिया को दिखलाया।
साहित्य की दुनिया में आपकी कमी खलती रहेगी,
आपकी अमर लेखनी सदा प्रेरणा देती रहेगी।
काश! फिर इस धरा पर आपका आगमन हो जाए,
साहित्य का हर कोना फिर से जगमग हो जाए।
शब्दों के उस महान साधक को शत-शत प्रणाम,
मुंशी प्रेमचंद जी, अमर रहे आपका नाम।
— गरिमा लखनवी
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