पतझड़ के सूखे पत्ते
पतझड़ के सूखे पत्तों सी
हमारी यह जिंदगानी है,
टूटकर शाखों से गिरना
जैसे इसकी कहानी है।
सूखे पत्ते गिरते जाते,
चुपचाप बिखर जाते हैं,
वैसे ही कुछ रिश्ते भी
समय के संग खो जाते हैं।
पर हर पतझड़ के बाद यहाँ
फिर से बहार आती है,
सूनी डाली पर हरियाली
नई उमंग जगाती है।
जीवन भी कुछ ऐसा ही है,
टूटकर फिर जुड़ जाता है,
हर अंत के बाद एक नया
सवेरा मुस्काता है।
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