प्रेम
प्रेम को कोई नहीं समझ सका,
प्रेम मुरझाने वाला फूल नहीं है।
यह शांत नदी है,
जो सदा मंद–मंद बहती है।
यह हवा का कोमल झोंका है,
जो हर मन को शीतल करता है।
प्रेम बारिश की बूंदें है,
जो तन–मन को भिगोती हैं।
प्रेम एक मीठा नशा है,
जो राधा को कृष्ण से था।
प्रेम है एक पवित्र मंदिर,
जहाँ एक है दिया और बाती।
प्रेम को समझना कठिन है,
प्रेम तो सभी करते हैं।
पर इसे निभाते बहुत कम,
यही इसकी सच्ची परीक्षा है।
प्रेम है गहरा समुंदर,
जिसकी थाह कोई न पाए।
प्रेम है ऐसी मधुर खुशबू,
जो हर दिल को महका जाए।
गरिमा लखनवी
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