इंसान बटता चला गया

धरती अम्बर एक सी लहू भी सबका एक का सा
फिर भी इंसान क्यों बटता चला गया
सरहदे बट गयी दिलो पे लकीरे खिच गयी
फिर भी इंसान बटता  चला गया
धर्म बट गया जाति बात गयी
खून सबका लाल ही रहा
सब एक ही है धरती के लाल है
पर सबके दिल में अंगार है
क्यों नफरत बढ़ रही है दिलो में
सब इससे परेशान है
इंसान क्या करे बेचारा
वो भी परेशान है
कितना बाँटो गे दिलो को नफरत के जंजीर से
क्यों नहीं घोलते सबके दिलो में
प्यार की जंजीर
उस प्यार से रंग जाये
सबके दिलो में घर कर जाये
राम अल्लाह की जमी को
मुस्कराहट से भर जाये
न बाँटो तुम इंसान को
न बाँटो  तुम भगवान को
गरिमा 

टिप्पणियाँ

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (04-05-2018) को "ये क्या कर दिया" (चर्चा अंक-2960) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
ज्योति-कलश ने कहा…
सार्थक चिंतन
Kailash Sharma ने कहा…
बहुत सुन्दर और सारगर्भित रचना...

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