मैं नारी हूँ

में आधुनिक नारी हूँ
स्वाभिमान से जीती हूँ
खुद्दारी है जीवन में
डर  का कोई नाम नहीं है
परुषो से आगे आयी हूँ
हर काम में लोहा मनवाया है
खेलो में ही या हिमालय पर
हर जगह अपना परचम लहराया है
हर घर की शान हूँ मैं
हर घर की पहचान हूँ मैं
मेरे बगैर यज्ञ न होते
न कोई पूजा होती पूरी
नारी एक शक्ति है
इसको क्यों नहीं मान लेते
छाए हो व्यापार करना
या हो राजनीती की बात
हर जगह है मेरी पहचान
नर नारी कदम मिलाकर चलते
ऐसी मेरी वाणी है
नारी एक चिंगारी है
गरिमा

टिप्पणियाँ

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (14-04-2017) को "डा. भीमराव अम्बेडकर जयन्ती" (चर्चा अंक-2940) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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