सोमवार, 2 सितंबर 2013

मर्त्य देश के निवासी

हम जिस देश में रहते है
वो मर्त्य हो चुका  है
सब जिन्दा लाश की तरह जी रहे है
अपराध बढ़ता जा रहा  है
कोई बचाने  वाला नहीं है
हर कोई ढूँढ रहा  है
कोई बचने आ जाये
पर मरे हुए देश में कौन  आएगा
हिंसा  का है बोलबाला
राजा ही नहीं अच्छी  है
तो प्रजा का क्या होगा
भगवान का नाम लेने वाले ही
माँ बहन की इज्जत लूट रहे है
क्या होगा ऐसे देश का
रखवाला ही लूट रहा  है
कौन बचेयेगा
हम कैसे देश के निवासी है
ये सोचना होगा
 

6 टिप्‍पणियां:

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - बुधवार -4/09/2013 को
मर्त्य देश के निवासी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः12 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

आपके भाव बिलकुल सही है और चारों और घनघोर अँधेरा ही दिखाई दे रहा है !

ajay yadav ने कहा…

वर्तमान परिदृश्य पर बेहतरीन रचना |
नई पोस्ट-“जिम्मेदारियाँ..................... हैं ! तेरी मेहरबानियाँ....."

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

निर्दोष हम भी नहीं ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बिलकुल सोचना होगा ... ओर अब नहीं सोचा तो शायद देर न हो जाए ...

राजीव कुमार झा ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति.
http://dehatrkj.blogspot.com