शुक्रवार, 7 जून 2013

देहज प्रथा

दुल्हन की डोली उठी
सज धज वो सुसराल चली
देहज का दानव संग् चला
जाते ही सुसराल वाले
तंग करने लगे
क्या लायी हो बहू घर से
वो बोलो  प्यार लायी हु
कहा  है पैसा और सामान
वो तो नहीं है मेरे पास
हुआ  मानवता का अंत
सब मिल करे अत्याचार
और जिन्दगी की साँस टूट गयी
एक अबला लड़की फिर रूठ गयी
रूठी अपने जीवन से
हो गया अंत
देहज का दानव खुश  हुआ
हुई उसकी जीत
हरा एक पिता बेचारा
क्या था उसका गुनाह
की एक लड़की अ जनम हुआ
उसके घर,
क्या लड़की होना गुनाह है?????????????


4 टिप्‍पणियां:

अरुन शर्मा 'अनन्त' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-06-2013) के चर्चा मंच पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

कालीपद प्रसाद ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति !
डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post: प्रेम- पहेली
LATEST POST जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

रचना दीक्षित ने कहा…

दहेज के दानव का अंत पता नहीं कब होगा. सुंदर संवेदनशील प्रस्तुति.

संजय भास्‍कर ने कहा…

क्या था उसका गुनाह
की एक लड़की अ जनम हुआ
उसके घर,
क्या लड़की होना गुनाह है?
.......सुंदर संवेदनशील प्रस्तुति