शनिवार, 28 मई 2016

चाँद की चमक

चाँद कहता है मुझसे
आदमी क्या अनोखा जीव है
उलझन खुद पैदा करता है
फिर न सोता है, और मुझसे बाते करता है
रात भर मेरी चमक में अपने को निहारता है
मेरी आगोश में आकर अपनी उलझन भूल जाता है
चाँद अपनी चांदनी के साथ हर गम भूल जाता है
चाँद पूरी रात सबको मीठी नींद सुलाता है
स्वप्न में लोग चाँद की चमक देखते है
और  देखते है हर दुःख सुख को अपने
और उन दुखो और सुखो को सुबह भूल कर
फिर चाँद का इंतज़ार करते है
की चाँद आये और हम अपने दुःख सुख
साथ बाटे और उसकी चांदनी में सब दुखो,
को भूलकर मीठी नींद  में सो जाये
और खो जाये चाँद की चमक में
गरिमा

3 टिप्‍पणियां:

रश्मि शर्मा ने कहा…

Kya ye aapki apni likhi panktiya hain?

रश्मि शर्मा ने कहा…

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है
Ye dinkar ji ki panktiyan hai jaha tak mujhe yaad hai.

garima ने कहा…

ji ye meri apni kavita hai