सोमवार, 2 जून 2014

रिश्ता

माँ बेटे का रिश्ता
होता है अनमोल
 रहता है अहसास माँ को
अपने बेटे के दुःख दर्द का
बेटा चाहे नालायक हो जाये
माँ तब देती है दुआ,
माँ होती है अनमोल
क्यों नहीं समझ पाता  है
बेटा उसका
क्यों सताता है, लड़ता है उससे
क्यों नहीं समझता उसके दिल का हाल
पर माँ तो माँ ही होती है
बच्चा कही भी उसका
हर आहट  की पहचान होती है
बेटा क्यों नहीं समझ पाता
की माँ होती है अनमोल
और जब माँ चली जाती है
तो उसे होता है  अहसास,
उसने क्या खो दिया
फिर पछताने पछताने से क्या होता ?
पर भूल   गए आज कल के  बच्चे
माँ का क़र्ज़ कोई नहीं उतार पाता
 ये रिश्ता होता है अनमोल


2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (03-06-2014) को "बैल बन गया मैं...." (चर्चा मंच 1632) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Digamber Naswa ने कहा…

माँ का कर्ज तो जीवन भर नहीं चुकाया जा सकता है ... अच्छी रचना ...