गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

जिंदगी से प्यार

तुम जिंदगी से  क्यों हार मान गए गये
 ऐसे तो न थे तुम,
जिंदगी को जीने वाले थे तुम
सबको हँसना सिखाते थे तुम
और  आज खुद ही रो दिए।
क्या हुआ जो कोई छूट गया?
क्या हुआ जो दिल गया ?
 पर खुश रहना आता था तुमको
चाहे कोई भी समय हो
जिंदगी हराने का नाम नहीं है
जिंदगी लड़ने का नाम है
चाहे  कुछ भी हो जाये
तुम खुश रहोगे
तुम्हारी पहचान तुम्हारा हसमुख स्वाभाव है
तुम नहीं तो कुछ नही नहीं है
सारी  खुशिया तुमसे ही है
क्या हुआ जो कोई दुःख आया
तुम इतना हिल गए
दुःख एक काली रात है
 उसे भूलकर फिर से मुस्कुराओ

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (18-04-2014) को "क्या पता था अदब को ही खाओगे" (चर्चा मंच-1586) में अद्यतन लिंक पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति...

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर.
नई पोस्ट : सृष्टि का नियंता : स्त्री या पुरुष

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत ही लाजवाब भाव, शुभकामनाएं.