बचपन की यादें

बचपन की यादे कितनी अच्छी होती है
आज उन यादो को ताजा करना अच्छा लगता है
कहा खो गया वो बचपन वो हसीन दिन
जब न होती थी कोई फ़िक्र
खेल में जिंदगी के दिन बीतते थे
न पढ़ने की फ़िक्र न कुछ करने की फ़िक्र
पापा की डाट खाना माँ का लाड
सब बहुत याद आता है
अब सब कुछ कही खो गया है
न वो बचपन रहा और न वो लाड रहा
वो स्कूल जाना और माँ के हाथ का पराठा खाना
सब कुछ याद आता है
बड़ो के बाते सुनना उस को हसी में उड़ाना
फुर्सत में दादी से कहानी सुनना
सब बहुत याद आता है
अब न वो नानी दादी की कहानी रही
न वो माँ के हाथ का पराठा रहा
न वो लाड रहा
सब कुछ टीवी मोबाइल पर सिमट कर रह गया है
माँ के हाथ के खाने ने फ़ास्ट फ़ूड ने ले ली है
बचपन बहुत याद आता है
-गरिमा

टिप्पणियाँ

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (20-12-2017) को "शीत की बयार है" (चर्चा अंक-2823) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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