शनिवार, 22 नवंबर 2014

जाड़ा का दिन

जाड़े की सुबह एक दिन
सूरज की किरणें से खेलती तितली
पूछती है दूसरी तितली से
तुम इतनी उदास क्यों है
 वो बोली सब तरफ अंधकार है
  जब सूरज की किरणें  आएगी
 तो क्या होगा मेरे देश का
   इसी चिंता में हूँ
     हर तरफ शोर है
हर कोई बेकारी झेल रहा है
 जाड़े की सुबह  सूरज निकलने से पहले
ये चिंता  सब   तितली करती है
क्या होगा मेरे देश का

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (23-11-2014) को "काठी का दर्द" (चर्चा मंच 1806) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'