शनिवार, 22 नवंबर 2014

जाड़ा का दिन

जाड़े की सुबह एक दिन
सूरज की किरणें से खेलती तितली
पूछती है दूसरी तितली से
तुम इतनी उदास क्यों है
 वो बोली सब तरफ अंधकार है
  जब सूरज की किरणें  आएगी
 तो क्या होगा मेरे देश का
   इसी चिंता में हूँ
     हर तरफ शोर है
हर कोई बेकारी झेल रहा है
 जाड़े की सुबह  सूरज निकलने से पहले
ये चिंता  सब   तितली करती है
क्या होगा मेरे देश का

रविवार, 16 नवंबर 2014

हम सब एक है

एक धरती एक उपवन
हम सब उसके बासी है
मिली धूप हमें एक बराबर
मिटटी के कर्ण के सामान हम
रूप रंग हो भले अलग हमारे
पर मन से हम एक  है
अलग अलग  है बोली हमारी
हम सब  फिर भी  एक है
सूरज एक हमारा है
जो किरणे फैलाता है
देता है रौशनी हमको
जग का  अँधेरा मिटाता है
एक चाँद है जो देता है
शीतलता हमको
फिर भी हम सब  एक है
कितना कुछ दिया हमको
पर हम समझ  न पाए
लड़ते  रहते है हम सब
क्यों न प्यार की भाषा समझाए
हम सब एक है ये सबको  बताये

रविवार, 9 नवंबर 2014

पिता

पिता एक वृक्ष के सामान
होता है,
जिसकी छाया में बच्चे अपना
घर बनाते है
और माँ होती है उसकी छाया
पिता की बाहें होती है मजबूत
सबको साथ लेकर चलती है
जाड़ा हो या गर्मी वो सब सह कर
भी देता है बच्चो को सुरक्षा
अपनी सुख की   परवाह न करते
देता है ख़ुशी अपने बच्चो को
पिता होता है महान
हर छोटी छोटी बातों का रखता है ख्याल
सब माँ को देते है सम्मान
पर दोनों का है काम महान
पिता न हो तो अधूरा है जीवन
पिता है सारे घर की शान
लोरी नहीं सुनाता है तो क्या
बच्चो को घूमता है वो
उसके साथ बच्चे भी होते है खुश
पिता को भी मिलना चाहिये सम्मान