शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

देेश और नेता



देश है तो नेता  है
नेता है तो जनता है,
जनता है तो वादे है
वादे है तो सपने है,
सपने है तो आशा है
आशा है तो नेता है
नेता है तो वादाखिलाफी है
घोटाला है तो घोटाला करने वाले नेता अफसर है
घोटाला करने वाले वाले नेता अफसर है तो काले धन्धे है
कले धन्धे है तो छानबीन है
छानबीन है तो सरकारी अफसर है
सरकारी अफसर है तो भष्ट्राचार है
भष्ट्राचार है तो घोटाला है,
सरकारी काम है तो कामचोरी है
कमचोरी है तो हडताल है
हडताल है तो बेकारी है
बेकारी है तो बेरोजगारी
बेरोजगारी है तो नेता है
नेता है तो घोटाला है
घोटाला है तो नेता है

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

महिलाओं की स्थिति चिंताजनक


यह बिडम्बना ही है कि आज स्त्री विमर्श चर्चा का विषय बन कर रह गया है। इसके लिये आन्दोलन भी होते है, पर कोई बदलाव नहीं आया है। क्या यह विषय मात्र चर्चा का रह गया है हर जगह लडकियो को ही त्याग करना पडता है। उन्हे शिक्षा से भी वंचित रखा जाता है, लडकियॉ एक नन्हे पौधे  की  भाति होती है जिसका बीज कही लगता है और पेड कही और बडा होता है। जब पौधा छोटा है तो उसकी देखभाल बहुत प्यार से की जाती है और एक दिन उसे दूसरे जगह लगा दिया जाता है। ऐसा ही कुछ लडकियो के साथ होता है। वहॉ माली पानी नही डालता है तो पौधा मुरझा जाता है उसी तरह से लडकियो के साथ होता है।
        क्या बिडम्बना है कि हर दूसरी लडकी कुपोषण का शिकार है। 1000 पुरूषों पर 914 लडकियॉ है कितनी भयावह स्थिति है। हर 10वी लडकी यौन शोषण का शिकार होती है। कितनी लडकियो को कोख में मार दिया जाता है क्या दोष है उनका बस यही कि वो लडकी है, क्यो नही उसे भी इन्सान समझा जाता है। आज भी लडका पैदा होनक पर मिठाई बटती है, और लडकी पैदा होने पर बहू को कोसा जाता है। यह भी सही है कि यह स्थिति आज से नहीे काफी पुरानी है। हमेशा लडकियो को ही सहना पडता है, हर जगह उनको ही झुकना पडता है। उन्हें पढाई से वंचित किया जाता है। उन्हे खाना अच्छा नहीं दिया जाता है जिससे वो कुपोषण का शिकार होती है। आज भी लडकियो को बोझ समझा  जाता  है
आज स्थिति बदल रही है हम लोग पढे लिखे की श्रेणी में आते है, लडकियो की पढाई पर ध्यान दिया जा रहा है। तभी लडकिया लडको से आगेे हर क्षेत्र में है। फिर भी लडकियो को मात्र घर की शोभा समझा जाता है।
    आजादी के समय भी महिलाओं ने बढ चढ का भाग लिया था, उस समय भी महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी उन्हें गुलामी की जिन्दगी जीनी पडती थी। उस समय भी महिलाओं ने नेतृृव्य सम्हाला था और आज भी सम्हाल रही है। भारत में सरोजिनी नायडू पहली ऐसी महिला थी जिन्होने ऐनी बेसेण्ट और अन्य लोगो के साथ मिलकर भारतीय महिला संघ की स्थापना की । उसके बावजूद भी महिलाओं की स्थिति ठीक नही रहीं, वंशवाद के नाम पर उन्हें प्रताडना सहनी पडती हैं। कन्या भ्रूण हत्या आज भी जोरो पर है। लडकी अपने घर में ही सुरक्षित नही है। शादी हो जाना ही मात्र विकल्प नहीं हैं।  शिक्षित होना भी जरूरी है। दहेज भी एक कारण है, लडकियो को जिंदा जला दिया जाता है, क्या उनका लडकी होना गुनाह है? अगर लडकिया नही होगी तो देश का भविष्य क्या होगा? यह कियी ने सोचा है।

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

विवेकानन्द और अध्यात्म


विवेकानन्द जी का नाम आते ही एक ऐसे महान हस्ती याद आती है जिन्होनें 39 वर्ष की आयु में ही समाज के लिये इतना काम कर दिया और समाज को एक दिशा दिखाकर वापस चले गये। पर क्या हम उनकी  शिक्षाओ को अपने जीवन में उतार पाये है यह बडा प्रश्न है? आज समाज जिस दौर से गुजर रहा है उसमे अध्यात्म की बडी कमी महसूस हो रही है। विदेष में रह रहे लोग अध्यात्म के तरफ बढ रहे है जबकि भारत अध्यात्म के लिये जाना जाता है, जहॉ कण कण मे भगवान बसते है वहॉ अध्यात्म खत्म होता जा रहा है।
हम कहते है ‘ मातृ देवो भव पितृ देवो भव’ अर्थात माता को भगवान समझो, और पिता को भगवान समझो’। परन्तु विवेकानन्द जी ने कहा ‘ दरिद्र देवो भव, मूर्ख देवो भव,’ इन गरीबों, अनपढों, अज्ञानियों और दुःखियों को ही अपना भगवान मानो। याद रखो केवल इन की सेवा ही तुम्हारा परम धर्म है, हमें बताया गया है कि आप सभी की सेवा करे सभी में भगवान बसते है। विवेकानन्द जी ने बताया कि केवल जानकारी प्राप्त करने से ही ‘शिक्षित’ नही कहला सकते जब तक हम उसे आत्मसात न करे तब तक वो पूर्ण शिक्षा नही होती । हमें अपने विचारो को इस तरह आत्मसात कर लेना चाहिए कि उनके द्वारा हमारा जीवन निर्वाण हो सके, हमारा चारित्रिक गठन हो सके और हम मनुष्य बन सके। गावॅ गावॅ जाकर प्रत्येक घर में धर्म के साथ- साथ षिक्षा को भी पहुचाना चाहिए।  विवेकानन्द जी ने बताया कि केवल ऑख ही ज्ञान प्राप्त करने का अकेला द्वार नहीं है, कान भी वह काम करता है। इस प्रकार उनमे नये नये विचारों, नैतिकता तथा अपने उज्जवल भविष्य के प्रति आशा का संचार होगा।
पुराने धर्म में पुनरूजीवन  का संचार एक नये केन्द्र द्वारा ही हो सकता है। अपने वादो और सिद्वान्तों को ताक में रख दो, वो कुछ काम नहीं आयेगें। इस समय एक चरित्रवान, एक जीवन देवतातुल्य मनुष्य को ही केन्द्र बनकर समाज का नेतृव्य करना होगा। इस मन्दिर के साथ एक और संस्था का निर्माण करना चाहिए जिसमें ऐसे षिक्षक तैयार हो जो धर्म- प्रचार करने और संस्था का निर्माण करना चाहिए जिसमें ऐसे षिक्षक तैयार हो जो धर्म- प्रचार करने और लौकिक षिक्षा देने के हेतू सर्वत्र भ्रमण करते रहे। उन्हें दोनो ही काम करने होगे। जैसे हम धर्म का प्रचार द्वार-द्वार जाकर कर रहे है, वैसे ही लौकिक ज्ञान का प्रचार भी करना पडेगा। अब इस योजना के लिए धन  कहा से आयेगातो उन्होने बताया कि धन का कोई महत्व नही है वास्तविक आवश्यक्ता धन की नही है क्योकि वे मेरे गुलाम है न कि मैं उनका गुलाम हॅू। धनादि प्रत्येक चीज को आना ही होगा ऐसा विेवेकानन्द जी मानते थे।
हमे विवकानन्द जी के अध्यात्म के बारे में बात कर रहे है तो उन्होने बताया कि धर्म की सच्ची साधना प्रत्येक व्यक्ति का निजी विषय होना चाहिए। धर्म का सैद्वान्तिक पक्ष का विवेचन एवं प्रचलन सार्वजनिक तौर पर किया जा सकता हैं, उसे सामूहिक रूप दिया जा सकता है। किन्तु उच्चतर धर्म- साधना को सार्वजनिक रूप नही दिया जा सकता। जो किसी की चिन्ता नही करता उसके पास सब कुछ अपने आप ही आ जाता है। विवेकानन्द जी बताते है प्रत्येक कार्य को तीन अवस्थाओं से गुजरना पडता है- उपहास, विरोध और अन्त में स्वीकृति किसी योजना का निरादर कर उसे निरूत्तसाहित नही करना चाहिए। आलोचना नही सहायता करनी चाहिए जो ठीक न हो उसे ठीक कर दो क्योकि आलोचना ही समस्त उपद्रव का जड है। आज के परिवेश में उनकी बाते कितनी सार्थक है।
क्या हम आज उनकी बाते मानते है ये बडा प्रश्न है? अगर मानते तो आज जो देष में हो रहा है वो नही होता 150 वी जयन्ती मना रहे है पर देष के नौजवान भटक रहे है विवेकानन्द जी की सोच को उतारना होगा सभी को अपने जीवन में, तभी पूरा होगा उनके सपनों का भारत। विवेकानन्द जी ने का मानना था कि विपरीत स्थितियॉ ही हमारी सर्वश्रेष्ठ कसौटी होती  है, जो हमें तराशकर चमकता हुआ हीरा बना देती है। उन्होने बताया धर्म ऐहिक जीवन के लिये भी है और पारमार्थिक जीवन के लिये भी।धर्म के जिस अंग का सम्बन्ध केवल पारमार्थिक जीवन से, पारमार्थिक कल्याण से है, उसी का रिलीजन, या मजहब, या अपासना पंथ, या संप्रदाय ऐसा नाम है। ये सब धर्म के अंग है। यही विश्वधर्म है। स्वामी जी कहते है एक तो कोई धर्म ही नही रहेगा और रहेगा तो वह हिन्दू धर्म ही रहेगा। गुरू रविन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि, ”यदि भारत को जानना चाहते हो तो विकेकानन्द को पढो“वे ईश्वर के करीब थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना उनकी विशिष्टता थी। स्वामी जी द्वारा दिखाये गये रास्तो पर कितने लोग अमल कर रहे है, वो जो युवा वर्ग के लिये सोचते थे वो आज की पीढी नही सोचती है।
हमें भी स्वामी जी के बताये रास्तो पर चलना होगा तभी सही मायनो मे हम उनकी जयन्ती मना पायेगें  

सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

मॉ की महिमा निराली


मॉ की महिमा निराली होती है। नवरात्र में हर तरफ उन्ही की धूम है। पूरा देश इस समय पूजा में व्यस्त है, सभी किसी न किसी तरह से मॉ को खुश करने में लगे हुए है पर अफसोस की बात यही है कि जिसकी पूजा आज सारा संसार कर रहा है उसकी अस्मत की रक्षा कोई नहीं कर पाता है। यही बिडम्बना है कि जिस मॉ ने हमें जन्म दिया उसकी रक्षा हम नहीं कर पाते है। मॉ का नाता जन्म से नहीं सासों से होता है फिर भी कोई नहीं समझ पाता है, जो मॉ को समझने का दावा करते है क्या वो मॉ की हर बात को समझ पाते है उसकी त्याग, तपस्या, बलिदान, तप यह सोचनीय विषय है मॉ को कोई नही समझ सका है। मॉ एक अहसास है, पर कोई नही जानता । मॉ शब्द से हर कोई जुडा हुया है, खुद गीले में सोकर हमें सूखे में सुलाती है।
आज जो हो रहा है वो कितना बुरा हो रहा है, मॉ की इज्जत को तार-तार किया जा रहा है जिस मॉ ने हमें जन्म दिया उसकी स्थिति खराब कर रहे है। क्या किसी ने सोचा कि अगर लडकी न हो तो क्या मॉ मिल पायेगी। मॉ के हाथ का खाना खाकर उसके गोद में सर रखकर साने का आनंद ही कुछ अलग है। बच्चे को समाज में एक मुकाम पर पहुचाती है मॉ महान होती है।
मॉ तेरे अनेको नाम
तूझे करुू मै प्रणाम,
सब दुख सहती कुछ न कहती
तुझ से शुरु होती मेरी पहचान,
तू करुणा का सागर है,
तू ही है गीता कुरान
तुझ में है रब की शान,
तुमने हमको चलना सिखाया
इस संसार से लडना सिखाया,
तेरे गुण गाये सुबह शाम
मॉ तुझे प्रणाम।