शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

हिंदी की दुर्दशा

एक और हिंदी दिवस आ गया
और हमने हिंदी को  याद कर  लिया लिया
 तो क्या मात्र हिंदी दिवस
मना लेने से इतिश्री होगा
 हिंदी  की   दुर्दशा का  क्या  कहना
आज तो अंग्रेजी भी  हिंदी में मिलने लगी है
  आलम यह है कि हर जगह 
अंग्रेजी  का असर है
अब तो हिंदी भी अंग्रेजी का गुलाम हो गयी है,
आज हिंदी रोती है
कि आने वाली मुझे कैसे समझेगी
मात्र हिंदी दिवस पर हिंदी को याद
कर लेना काफी नहीं
हिंदी चीखकर कह रही है
कि मुझे बचाओ ! मुझे बचाओ
पर उसकी चीख सुनकर भी हम
अनसुना कर देते है



4 टिप्‍पणियां:

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शनिवार- 18/10/2014 को नेत्रदान करना क्यों जरूरी है
हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः35
पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें,

राजेन्द्र अवस्थी ने कहा…

बहुत ही ज्वलंत विषय पर बेहतरीन लिखा आपने बस पोस्ट करने से पूर्व वर्तनी पर कृपया ध्यान दें।

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Log faishan me choor hain aur angreji ek faishan ki bhasha hai isliye iska prayog badh gya hai saadagi yaani hindi ka kam ho gya hai... Behad zaruri hai mahatv samjhna apni bhasha ka ..garw anubhav karein ... Aur bole hindi hain hum hindi hi bolenge.... Aapki prastuti umdaa ...sochane ka vishay ...!!

Rajesh Yadav ने कहा…

ये सचमुच चिंतन का विषय है।

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