रविवार, 1 सितंबर 2013

मानवता खो गयी

मानवता खो गयी यहाँ
हर कोई है स्वार्थ में डूबा
पैसे की चकाचोंध में
क्या बच्चा क्या बूढा
हर कोई लिप्त है माया में
जनता पिस रही है महगाई  से
ऐश कर रहे है नेता
अमीर अमीर हो रहे है
गरीब और गरीब
कोई नहीं पूछता किसी से
तुम क्यों उदास हो
क्या हुआ तुम्हे
मानवता के नाम पर सब शून्य
किसी के मरने जीने से
किसी को नहीं फर्क पड़ता
दुनिया है बढती रहेगी
क्या होगा ऐसे में
न कोई त्यौहार पर
किसी से मिलता है
मानवता का अंत हो रहा  है
यही कलयुग है
क्या कहे इसका
न कोई अंत है
न शुरुआत 

4 टिप्‍पणियां:

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - सोमवार -02/09/2013 को
मैंने तो अपनी भाषा को प्यार किया है - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः11 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra




कालीपद प्रसाद ने कहा…

मानवता का अंत हो रहा है
यही कलयुग है
अंत का शुरुयात
latest post नसीहत

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता .
http://dehatrkj.blogspot.com

Kartikey Raj ने कहा…

इस कलयुग में मानवता खोटी ही चली जा रही है, सुंदर लेख.......