शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

क्यों कुर्बान होती है नारी

संस्कारो की भेट चढ़ती है नारी
खुशियों की दुकान की चाभी है नारी
राष्ट्र का सम्मान  है नारी
फिर नारी होती है कुर्बान
आचल में समेटे है परिवारों की खुशिया
फिर भी सहती है सबकी बाते
लोगो को ताने भी सहती है नारी
फूल जैसी होती है नारी
घर का अभियान होती है नारी
मीठी जुबान होती है नारी
सर्जन की जननी है नारी
पर सभी का पहचान होती है नारी
गरिमा का नाम है नारी
फिर क्यों कदम कदम पर होती है कुर्बान नारी
तपस्या त्याग की पहचान है नारी
फिर भी सहती है नारी
अपमान और जिल्लत सहती है नारी
तभी वो बर्दाशत करती है हर बात को
समझो न नारी को खिलौना
अपनी पर आ जाये तो दुर्गा है नारी
उसको पास होती है उम्मीद की एक दुनिया
आचल फेलाए तो ठंडी बयार है नारी
समझो न उसको  दीन  हीन 
शक्ति का अवतार है नारी
फिर क्यों कुर्बान होती है नारी

शनिवार, 7 सितंबर 2013

गुरु की महिमा

गुरु ने हमको सिखाया
सही राह पर चलना है,
गुरुवर ने दिया है ज्ञान
परोपकार,भाईचारा,मानवता,
का,
जो राह हमें दिखायी
वही हम ओरो को दिखाये
सच्चाई और सहानभूति को
आगे हम और बढ़ाये
गुरु की महिमा को
कोई न समझ पाया
कठिन डगर हो या काटो वाली
उस पर चलना सिखाया
जीवन के हर मोड़ पर
गुरु  के आदर्श जरुरी है,
न हो गुरु  जीवन में
तो जीवन अँधियारा है
माना है जग ने भगवान  से पहले
गुरु नाम तुम्हारा है,
जो राह दिखाई तुमने
उस पर चलते  जाना है,
चाहे हो काटो का सफ़र
हसकर बढ़ते जाना है
हे गुरु तुम्हे शत शत नमन   

सोमवार, 2 सितंबर 2013

मर्त्य देश के निवासी

हम जिस देश में रहते है
वो मर्त्य हो चुका  है
सब जिन्दा लाश की तरह जी रहे है
अपराध बढ़ता जा रहा  है
कोई बचाने  वाला नहीं है
हर कोई ढूँढ रहा  है
कोई बचने आ जाये
पर मरे हुए देश में कौन  आएगा
हिंसा  का है बोलबाला
राजा ही नहीं अच्छी  है
तो प्रजा का क्या होगा
भगवान का नाम लेने वाले ही
माँ बहन की इज्जत लूट रहे है
क्या होगा ऐसे देश का
रखवाला ही लूट रहा  है
कौन बचेयेगा
हम कैसे देश के निवासी है
ये सोचना होगा
 

रविवार, 1 सितंबर 2013

मानवता खो गयी

मानवता खो गयी यहाँ
हर कोई है स्वार्थ में डूबा
पैसे की चकाचोंध में
क्या बच्चा क्या बूढा
हर कोई लिप्त है माया में
जनता पिस रही है महगाई  से
ऐश कर रहे है नेता
अमीर अमीर हो रहे है
गरीब और गरीब
कोई नहीं पूछता किसी से
तुम क्यों उदास हो
क्या हुआ तुम्हे
मानवता के नाम पर सब शून्य
किसी के मरने जीने से
किसी को नहीं फर्क पड़ता
दुनिया है बढती रहेगी
क्या होगा ऐसे में
न कोई त्यौहार पर
किसी से मिलता है
मानवता का अंत हो रहा  है
यही कलयुग है
क्या कहे इसका
न कोई अंत है
न शुरुआत