शनिवार, 17 अगस्त 2013

पत्थरों का शहर

पत्थरों  के इस शहर में
किस  से दिल  लगाऊ
हर कोई लगाये  है चहेरे
कोई नहीं लगता है अपना
 किस से दर्द बताऊ
पत्थरों के शहर में
न दिलहै न जज्बात,
हर कोई लगता है झूठा
कैसे  हाल बताऊ
सब कोई हँसते है हम पर
का से दर्द बताऊ
पत्थरों के शहर में
हर कोई हेरान है

5 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

खुबसूरत अभिवयक्ति......

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति आज रविवार (18-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण- 89" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

Swati Vallabha Raj ने कहा…

पत्थरों के शहर में सरे एहसास पत्थरों के हो गए हैं …. सुन्दर रचना ….

Darshan jangra ने कहा…

सुन्दर रचना


hindiblogsamuh.blogspot.com

शिवनाथ कुमार ने कहा…

हम अपने दिल का हाल अक्सर पत्थर के सामने ही बोलते हैं
किसी किसी की वो सुन भी लेता है :-)

बहुत सुन्दर रचना !