सोमवार, 29 जुलाई 2013

एक युग पुरुष

था सच्चा बेटा इस धरती का
कर गया बड़े वो
जिसके आगे दुनिया झुकती
था उसका नाम विवेकानन्द
जीना उसने है सिखलाया
वरना  हम क्या क्या करते
अपने लिए  तो सब जीते है
पर जीना आये  दूसरो  काम
था नाज जिसे अपनी धरती पर
कर गया संसार  नाम वो
है सबमे साहस  मानवता का
 सिखला गया साहस का पाठ वो,
ना  जात्ती पाती न उच नीच
सब है बराबर
इस  जहा में
ऐसा पाठ  पढ़ाया  उसने
देशप्रेम की ललक उठे
सिखलाया की  कैसे हो
नए समाज का सर्जन यहाँ
काटो पर चलकर  भी उसने
कर  दिया गर्व  से नाम अमर
हे नाज हर भारतवासी को 
 क्यों न होते आब विवेकानंद
छोटी सी आयु में ही
कर गए वो नाम अमर
अब हम सबकी है बारी
कर जाये एक नए समाज का
निर्माण यहाँ

सोमवार, 8 जुलाई 2013

कौन है वो

कौन है वो जिसका है इंतजार
 खड़ा दरवाजे पर कौन
किसकी है आहट
दबे पाँव कोई आ रहा  है
हुई  थोड़ी  सी हलचल
आ गया  वो
ये तो कोई अजीब सा इन्सान है
किसे लेने  आया है
 एक सांस टूटी
और ले गया वो अजीब इन्सान
एक ज्योति
और छोड़ गया वो निर्जीव शरीर
किसके लिए
सिर्फ रोने के लिए
एक मलाल रहा
कुछ न कर पाए हम
इस जिन्दगी में
बेकार हो गया जीवन
व्यर्थ की बातो में
 अब  एक आस   आयेंगे
फिर से इस जहा में
कुछ के तो आसूं पूछ पाएंगे हम