रविवार, 30 जून 2013

दर्द न जाने कोय

आखे नम हर तरफ तभाही का मंजर
सब बिछड़े और  समा गए
  काल  के हाथो में
अपनों का दर्द
 सहा नहीं जाता
पर भगवान की मर्जी के
आगे रहा नहीं जाता
आओ हाथ बढ़ाये
रोतो को हँसाये
बिछड़ो को मिलाये
और ले संकल्प
न करेंगे प्रक्रति से छेड़ छाड़
नहीं तो फिर एक बदल फ़टेगा
और कितनो को और ले जायेगा जायेगा
अपने संग  खुद ही दोषी है
पर खुद का दोष दिखता  नहीं    
इस काल के आगे
अपना बस चलता नहीं
मेरी यही गुजारिश है दोस्तों
इस दर्द को समझो
और बढ़ो आगे 
दो सहारा उनको
जिनका कोई नहीं
इस जहा में
हम किसी के आसू पोछ
पाए तो
समझो जीवन हुआ सार्थक
हमारा दोस्तों 
 

रविवार, 16 जून 2013

पिता जीवनदाता

 पिता होता है जीवनदाता
माँ की तरह प्यारा
माली की तरह सीचा हमको
बचाकर रखा हमें सब दुखो से
जैसे  पॊधो  को सम्हालते
वैसे पिता हमें सम्हालते
हर बात हमारी करते पूरे
अपने भूके रहकर भी वो
पेट हमारा भरते है,
दुखो की परछाई भी हम पर
न  पड़ने देते
पिता से ही बच्चो  का दुलार है
पिता से हर त्यौहार है
पिता से ही माँ का सुहाग है
पिता से ही जीवन का  संचार है
पिता नहीं तो जीवन अनाथ है
पिता भगवान के बाद दूजा नाम है
पिता नहीं तो जीवन बेकार है
पिता ही जीवन की साँस है

शुक्रवार, 14 जून 2013

शादी और मौत में समानता

शादी का ख्याब हर कोई  सजाता है,
और चाहता है बंध जाये ऐसे बंधन में
जो टूटे से भी न टूटे,
और मौत भी एक ऐसा बंधन है
जो बंधन अटूट होता है,
एक दिन सबकी खुशियों है लिए
जाना  होता है पराये घर
और जाना होता है सबको
दुखी करके भगवन के  पास
क्या समानता होती है
दुल्हन सजती है,
घर सजता है
और जब मौत होती है
तो भी सजाया जाता है
दुलहन  को उसके दुसरे घर
भेज  दिया जाता है,
और अर्थी को भी सजा कर 
भेज दिया जाता है उसके दुसरे घर
शादी में भी आसू बहते है
और मरने पर भी
कितनी समनाता है
पर एक जगह जिन्दगी शरू
होती है,
और एक जगह खत्म
सब चले जाते है आसू बहाकर
और रह जाती है बस यादे

 

मंगलवार, 11 जून 2013

सावन

सावन आया बारिश लाया
तपती गर्मी से राहत  लाया
पेड़ पॊधे सब भीग गए
और हरियाली छा गयी
सब को मिली राहत गर्मी हुई गायब
सावन की बूंदों में कितना अपनापन होता है
मन नहीं रहता बस में
मिलने को  करता है,
सुंदर  सपने आते है
सावन में,
सब होते कितने खुश
सावन में होता मन इतना प्रफुलित
हर तरफ हरियाली की चादर ओढ़े
धरती ने ओढ़ी चुनरिया
हर कोई मस्त है सावन की बूंदों में
सावन की  होती बात निराली
हर कोई डूब जाना चाहता है सावन के मौसम में

सोमवार, 10 जून 2013

राजनीति

राजनीति का खेल निराला  होता है
हर कोई इस खेल का खिलाडी होता है
हर कोई पांच साल का  गेम में मस्त
 विचार कैसे भी हो
 मकसद एक ही है
कोई  भी हो पार्टी  
सब कर रहे देश को बर्बाद
लूट मार का हो रहा व्यापर
हर तरफ हाहाकार
पांच साल बाद आते है
और झुककर करते है सलाम
और कहते है की हम सा न
कभी हुआ  न होगा
जनता  है हेरान
क्या होगा इस देश का
कोई नहीं जानता
राजनीति का खेल निराला  होता है

रविवार, 9 जून 2013

कजरारे बादल

बादल आये बादल आये
काले काले बादल आये
जब टकराते है आपस में,
तो होती है बरसात
और धरती की प्यास बुझा
देता है आकाश
जब बादल टकराते है
तो मानो दो प्रेमी एक दुसरे से बाते करते
नज़र आते है,
क्या  सुंदर नज़ारा होता है
सब तरफ खिली खिली महक होतीहै
काले बादल  एक सन्देश लाते  है
हर  तरफ बिखेरो खुशियों की चांदनी
न रहे कोई उदास
इस जमी पर
सब और बिखरी हो खुशियों की बरसात
काले बादल काले बादल
छाए है नभ के उपर




शुक्रवार, 7 जून 2013

देहज प्रथा

दुल्हन की डोली उठी
सज धज वो सुसराल चली
देहज का दानव संग् चला
जाते ही सुसराल वाले
तंग करने लगे
क्या लायी हो बहू घर से
वो बोलो  प्यार लायी हु
कहा  है पैसा और सामान
वो तो नहीं है मेरे पास
हुआ  मानवता का अंत
सब मिल करे अत्याचार
और जिन्दगी की साँस टूट गयी
एक अबला लड़की फिर रूठ गयी
रूठी अपने जीवन से
हो गया अंत
देहज का दानव खुश  हुआ
हुई उसकी जीत
हरा एक पिता बेचारा
क्या था उसका गुनाह
की एक लड़की अ जनम हुआ
उसके घर,
क्या लड़की होना गुनाह है?????????????