बुधवार, 30 जनवरी 2013

कंकड़

कंकड़ का क्या अस्तिव
एक छोटा सा टुकड़ा
जो घर पर मारो तो काच टूट जाये
बने तो घर की नीव बन जाये
जितना छोटा कंकड़
उतने उसके फायदे
प्रेमी इसका उपयोग प्रमिका को जागने में करते
बच्चे नदी में मारते,
जब मारते तो नदी में होती है हलचल
तो बच्चे होते है खुश
कंकड़ क्या होता है
इतना छोटा सा कड
क्या क्या कमाल दिखाता है
प्रेमी के लिए है वरदान
कंकड़ न होता तो क्या
होता
दुनिया होती कितनी  वीरान
कंकड़ है कितना छोटा सा
पर काम  करता कितने महान 

फिर छाया बसंत

सजी धरती आज फिर
पीली चुनरिया ओढ़कर,
हर तरफ छाई  है फूलो की महक
हर कोई खुश  है
आम की बोर देखकर
सूरज ने भी आखे खोली
सरसों भी फूली हुई है चारो और
आया सखी फिर से बसंत
कोयल की कूक है चारो ओर,
सब कुछ लगता कितना नया
फागुन खड़ा है  दरवाजे पर
सब पर है मस्ती छाई
और छाई है माँ सरस्वती  की
आराधना की  धूम
हर कोई नाच रहा है
ठण्ड से मिली राहत
आया सखी फिर से बसंत

शनिवार, 26 जनवरी 2013

सिर उचा रहे देश का

 शान न भारत की घटने पाए
हम भारत के बेटे है,
जान दे देंगे हम
पर देश पर आच न आने देंगे
64  साल बीत गए
आओ सोचे क्या खोया हमने
और कहा पर हम  आये
64 साल  बाद भी हम
मानसिक  रूप से   गुलाम रहे
हम अब भी देश से न  जुड़ पाए
तो हम क्या कर पाएंगे
केवल बुराई करके,
हम अपने फ़र्ज़ से
क्या हम सोचो बच  पाएंगे
आज फिर से  विचार करे हम
क्या खोया क्या पाया है
कितना हम देश से जुड़ रहे
और कितना हम  भाग रहे
आज फिर वो समय आ गया
जब हम फिर से  संकल्प ले
की भारत की शान  खोने न देंगे
  


गुरुवार, 24 जनवरी 2013

नारी


नारी  हू   में
मुझमे  है छमता,
फिर  क्यों समझते है
कमजोर  मुझे,
 मैंने सबको चलना सिखाया,
 सब कुछ भूल किया सब  अर्पण
फिर भी क्यों हू में अबला
सहनशक्ति है मेरे अंदर
दुर्गा का रूप हू
फिर भी क्यों नहीं मानते
सब  क्यों कहते है नारी तो
बर्बादी है
नारी न होती तो ये दुनिया न
होती
ये क्यों नहीं मानते है
आज हर जगह बदनाम हो  रही
क्यों सब  ऐसा काम कर रहे
मेरे अंदर भी है एक जान
ये  क्यों नहीं जानते
   

शनिवार, 19 जनवरी 2013

प्रेम


प्रेम  शब्द  है  या  विस्बास
क्या है प्रेम?
 प्रेम  अनछुआ सा  अहसास है
   जो महसूस किया जाता है
  प्रेम को कोई नहीं समझ सका है,
प्रेम  था   राधा का
 ऐसा प्रेम कहा मिलता है,
प्रेम सावन की  बूंदे है
प्रेम बहती नदी है
 प्रेम हर  एक  जगह  में है
फिर भी  लोग लड़ते है
क्यों?
 अगर सब यही समझ  ले तो  
नफरत के लिए जगह ही न  रहे,
प्रेम हो हर तरफ तो
दुनिया  कितनी अच्छी हो