बुधवार, 25 दिसंबर 2013

मानवता खो गयी कही

आज मानवता खो गयी कही
हर कोई लूटने में है लगा
कैसे हम  आगे बढे
इसी सोच में है डूबा,
लूट रही है अस्मिता नारी की
कहा रह गयी मानवता
किसी  को हो दुःख
तो लोग बना देते है मजाक
कहा है संवेदना
बड़े घरो में जो रहते है
वो और भी दुखी है
हर कोई उसका उठाता  है
फायदा  
 कहा है मानवता
 हर तरफ   है अँधियारा
कौन दीप जलाये
और जो खो रही मानवता
उसे ढूढ कर लाये

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

नारी सहने का नाम नहीं

नारी सहने का नाम नहीं है,
नारी जननी है,नारी रक्षक है,
  अगर नारी न
 यह दुनिया बेगानी है,
फिर भी क्यों होते जुल्म होते नारी पर
पुरुषो का शिकार बनती है नारी
पर फिर भी सहती है
माँ, बेटी, बहन, भाभी
है अनेको रूप इसके
नारी को जाता है पूजा पूजा
फिर भी कलयुग में रहे है
सितम इस  पर
 क्या जन्म इसलिए है नारी का
इसे  सताया जाये जलाया जाये
कब तक सहेगी नारी
क्यों भगवान ने बनाया
 सहनशील नारी
नारी सहने का नाम नहीं है
अब  एक चिंगारी है नारी
ब   

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

बचपन

प्यारा बचपन न्यारा बचपन
और  कितना दुलारा बचपन
रोते  है हम चुप होते है
फिर  सपनो में खो जाते है,
परियो  की रानी आती है
खूब हसाती खूब खिलाती
कितना सुखमय बचपन
न  कोई चिंता न परशानी
सुनते  हम राजा की  कहानी
नानी दादी हमें सुनाती
हम न सोते  वो सो जाते
कितना भोला बचपन
बाते छोटी छोटी कहते 
सब सुन हस देते
प्यार  सभी को मिलता
ऐसा प्यारा बचपन
बचपन सुखमय होता है
प्यारा और दुलारा बचपन 

बुधवार, 13 नवंबर 2013

स्वप्न बिकते है


 स्वप्न बिकते है बोलो  खरीदोगे
कोई रोजगार  का स्वप्न बेचता
 तो नेता महगाई कम करने का
गरीबी हटाने का
साधू बेचते है भगवान को पाने का
 कहते है कई लोग  हम आपको
 बना देंगे अमीर,
हर कोई स्वप्न में है डूबा
 अभी  आ रहे है चुनाव
 सब को यही लालच है
हम  बन जाये   अमीर
कोई  काम नहीं करना चाहता
कंपनी कहती है मेरा सामान खरीदो
तो  तुम्हे मिलेगा सोना का सिक्का
पर जनता है मुर्ख
 वो ये नहीं समझती
कोई   अपने घर से कुछ नहीं लाता
सब जनता से  करते है
स्वप्न  बिक रहे है
सब सपनो में  जीते है
 क्या होगा नोजवानो का
 जो इन दिवास्वप्न में जीते है
स्व्प्न बिकते है बोलो खरीदोगे 
 

सोमवार, 11 नवंबर 2013

नेताओ की लड़ाई

देश  के नेता  लड़ रहे है
कुत्ते बिलिओ की  तरह,
हर नेता को चहिये सत्ता
भले ही जनता चाहे  हो कितनी फटेहाल
हर पाँच वर्ष में यह है जागते
 किसी को प्याज की चिंता
तो किसी को याद आता है हिंदुत्व
कुछ तो ऐसे है जो सजाये है ख्याब
अगर सत्ता मिल जाये
तो कैसे माल कमाये,
जनता बिचारी फटेहाल
कोई डूबा शेयर मार्केट में
तो कोई महंगाई से परेशान
चारो तरफ है नारा
हमें वोट दो हमें वोट दो
और उन नौजवानो का
मिल गया गुजारा
अब  उनको मिल रहा है काम
कि नेता जी को वोट दिलाओ
और हमसे माल कमाओ
कहा जायेगी इस देश कि जनता
हर नेता है  पैसे का भूखा
किसको जिताओ भैया
इससे अच्छा मुँह ढ़ककर  सो जाओ भैया 

बुधवार, 6 नवंबर 2013

अँधेरी रात में दिया कौन जलाये

अँधेरी रात है कौन दिया जलाये
कोई प्रकाश  की  किरन नहीं
कौन जग में दिया जलाये
कल्पना के बीज बो दिए
पर उजाले में वो दिवास्वप्न  लगता है,
है बेरोजगारी  चारो तरफ
मन है नोजवानो के अँधियारा
अँधेरी रात है कौन दिया जलाये
भटकाव का अँधियारा है
प्रजा में है अँधियारा
कोई राजा नहीं है जो दीप   जलाये
 और अपने राज्य में अँधेरा मिटाये
 हर तरफ अँधेरा है
ऐसे में  सब मिल दीप जलाये
अपने चारो तरफ का अँधेरा मिटाये
अँधेरा बेरोजगारी का, भ्रष्टाचार का
जातिवाद  का
और अपने देश को जगमगाए 

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

देेश और नेता



देश है तो नेता  है
नेता है तो जनता है,
जनता है तो वादे है
वादे है तो सपने है,
सपने है तो आशा है
आशा है तो नेता है
नेता है तो वादाखिलाफी है
घोटाला है तो घोटाला करने वाले नेता अफसर है
घोटाला करने वाले वाले नेता अफसर है तो काले धन्धे है
कले धन्धे है तो छानबीन है
छानबीन है तो सरकारी अफसर है
सरकारी अफसर है तो भष्ट्राचार है
भष्ट्राचार है तो घोटाला है,
सरकारी काम है तो कामचोरी है
कमचोरी है तो हडताल है
हडताल है तो बेकारी है
बेकारी है तो बेरोजगारी
बेरोजगारी है तो नेता है
नेता है तो घोटाला है
घोटाला है तो नेता है

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

महिलाओं की स्थिति चिंताजनक


यह बिडम्बना ही है कि आज स्त्री विमर्श चर्चा का विषय बन कर रह गया है। इसके लिये आन्दोलन भी होते है, पर कोई बदलाव नहीं आया है। क्या यह विषय मात्र चर्चा का रह गया है हर जगह लडकियो को ही त्याग करना पडता है। उन्हे शिक्षा से भी वंचित रखा जाता है, लडकियॉ एक नन्हे पौधे  की  भाति होती है जिसका बीज कही लगता है और पेड कही और बडा होता है। जब पौधा छोटा है तो उसकी देखभाल बहुत प्यार से की जाती है और एक दिन उसे दूसरे जगह लगा दिया जाता है। ऐसा ही कुछ लडकियो के साथ होता है। वहॉ माली पानी नही डालता है तो पौधा मुरझा जाता है उसी तरह से लडकियो के साथ होता है।
        क्या बिडम्बना है कि हर दूसरी लडकी कुपोषण का शिकार है। 1000 पुरूषों पर 914 लडकियॉ है कितनी भयावह स्थिति है। हर 10वी लडकी यौन शोषण का शिकार होती है। कितनी लडकियो को कोख में मार दिया जाता है क्या दोष है उनका बस यही कि वो लडकी है, क्यो नही उसे भी इन्सान समझा जाता है। आज भी लडका पैदा होनक पर मिठाई बटती है, और लडकी पैदा होने पर बहू को कोसा जाता है। यह भी सही है कि यह स्थिति आज से नहीे काफी पुरानी है। हमेशा लडकियो को ही सहना पडता है, हर जगह उनको ही झुकना पडता है। उन्हें पढाई से वंचित किया जाता है। उन्हे खाना अच्छा नहीं दिया जाता है जिससे वो कुपोषण का शिकार होती है। आज भी लडकियो को बोझ समझा  जाता  है
आज स्थिति बदल रही है हम लोग पढे लिखे की श्रेणी में आते है, लडकियो की पढाई पर ध्यान दिया जा रहा है। तभी लडकिया लडको से आगेे हर क्षेत्र में है। फिर भी लडकियो को मात्र घर की शोभा समझा जाता है।
    आजादी के समय भी महिलाओं ने बढ चढ का भाग लिया था, उस समय भी महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी उन्हें गुलामी की जिन्दगी जीनी पडती थी। उस समय भी महिलाओं ने नेतृृव्य सम्हाला था और आज भी सम्हाल रही है। भारत में सरोजिनी नायडू पहली ऐसी महिला थी जिन्होने ऐनी बेसेण्ट और अन्य लोगो के साथ मिलकर भारतीय महिला संघ की स्थापना की । उसके बावजूद भी महिलाओं की स्थिति ठीक नही रहीं, वंशवाद के नाम पर उन्हें प्रताडना सहनी पडती हैं। कन्या भ्रूण हत्या आज भी जोरो पर है। लडकी अपने घर में ही सुरक्षित नही है। शादी हो जाना ही मात्र विकल्प नहीं हैं।  शिक्षित होना भी जरूरी है। दहेज भी एक कारण है, लडकियो को जिंदा जला दिया जाता है, क्या उनका लडकी होना गुनाह है? अगर लडकिया नही होगी तो देश का भविष्य क्या होगा? यह कियी ने सोचा है।

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

विवेकानन्द और अध्यात्म


विवेकानन्द जी का नाम आते ही एक ऐसे महान हस्ती याद आती है जिन्होनें 39 वर्ष की आयु में ही समाज के लिये इतना काम कर दिया और समाज को एक दिशा दिखाकर वापस चले गये। पर क्या हम उनकी  शिक्षाओ को अपने जीवन में उतार पाये है यह बडा प्रश्न है? आज समाज जिस दौर से गुजर रहा है उसमे अध्यात्म की बडी कमी महसूस हो रही है। विदेष में रह रहे लोग अध्यात्म के तरफ बढ रहे है जबकि भारत अध्यात्म के लिये जाना जाता है, जहॉ कण कण मे भगवान बसते है वहॉ अध्यात्म खत्म होता जा रहा है।
हम कहते है ‘ मातृ देवो भव पितृ देवो भव’ अर्थात माता को भगवान समझो, और पिता को भगवान समझो’। परन्तु विवेकानन्द जी ने कहा ‘ दरिद्र देवो भव, मूर्ख देवो भव,’ इन गरीबों, अनपढों, अज्ञानियों और दुःखियों को ही अपना भगवान मानो। याद रखो केवल इन की सेवा ही तुम्हारा परम धर्म है, हमें बताया गया है कि आप सभी की सेवा करे सभी में भगवान बसते है। विवेकानन्द जी ने बताया कि केवल जानकारी प्राप्त करने से ही ‘शिक्षित’ नही कहला सकते जब तक हम उसे आत्मसात न करे तब तक वो पूर्ण शिक्षा नही होती । हमें अपने विचारो को इस तरह आत्मसात कर लेना चाहिए कि उनके द्वारा हमारा जीवन निर्वाण हो सके, हमारा चारित्रिक गठन हो सके और हम मनुष्य बन सके। गावॅ गावॅ जाकर प्रत्येक घर में धर्म के साथ- साथ षिक्षा को भी पहुचाना चाहिए।  विवेकानन्द जी ने बताया कि केवल ऑख ही ज्ञान प्राप्त करने का अकेला द्वार नहीं है, कान भी वह काम करता है। इस प्रकार उनमे नये नये विचारों, नैतिकता तथा अपने उज्जवल भविष्य के प्रति आशा का संचार होगा।
पुराने धर्म में पुनरूजीवन  का संचार एक नये केन्द्र द्वारा ही हो सकता है। अपने वादो और सिद्वान्तों को ताक में रख दो, वो कुछ काम नहीं आयेगें। इस समय एक चरित्रवान, एक जीवन देवतातुल्य मनुष्य को ही केन्द्र बनकर समाज का नेतृव्य करना होगा। इस मन्दिर के साथ एक और संस्था का निर्माण करना चाहिए जिसमें ऐसे षिक्षक तैयार हो जो धर्म- प्रचार करने और संस्था का निर्माण करना चाहिए जिसमें ऐसे षिक्षक तैयार हो जो धर्म- प्रचार करने और लौकिक षिक्षा देने के हेतू सर्वत्र भ्रमण करते रहे। उन्हें दोनो ही काम करने होगे। जैसे हम धर्म का प्रचार द्वार-द्वार जाकर कर रहे है, वैसे ही लौकिक ज्ञान का प्रचार भी करना पडेगा। अब इस योजना के लिए धन  कहा से आयेगातो उन्होने बताया कि धन का कोई महत्व नही है वास्तविक आवश्यक्ता धन की नही है क्योकि वे मेरे गुलाम है न कि मैं उनका गुलाम हॅू। धनादि प्रत्येक चीज को आना ही होगा ऐसा विेवेकानन्द जी मानते थे।
हमे विवकानन्द जी के अध्यात्म के बारे में बात कर रहे है तो उन्होने बताया कि धर्म की सच्ची साधना प्रत्येक व्यक्ति का निजी विषय होना चाहिए। धर्म का सैद्वान्तिक पक्ष का विवेचन एवं प्रचलन सार्वजनिक तौर पर किया जा सकता हैं, उसे सामूहिक रूप दिया जा सकता है। किन्तु उच्चतर धर्म- साधना को सार्वजनिक रूप नही दिया जा सकता। जो किसी की चिन्ता नही करता उसके पास सब कुछ अपने आप ही आ जाता है। विवेकानन्द जी बताते है प्रत्येक कार्य को तीन अवस्थाओं से गुजरना पडता है- उपहास, विरोध और अन्त में स्वीकृति किसी योजना का निरादर कर उसे निरूत्तसाहित नही करना चाहिए। आलोचना नही सहायता करनी चाहिए जो ठीक न हो उसे ठीक कर दो क्योकि आलोचना ही समस्त उपद्रव का जड है। आज के परिवेश में उनकी बाते कितनी सार्थक है।
क्या हम आज उनकी बाते मानते है ये बडा प्रश्न है? अगर मानते तो आज जो देष में हो रहा है वो नही होता 150 वी जयन्ती मना रहे है पर देष के नौजवान भटक रहे है विवेकानन्द जी की सोच को उतारना होगा सभी को अपने जीवन में, तभी पूरा होगा उनके सपनों का भारत। विवेकानन्द जी ने का मानना था कि विपरीत स्थितियॉ ही हमारी सर्वश्रेष्ठ कसौटी होती  है, जो हमें तराशकर चमकता हुआ हीरा बना देती है। उन्होने बताया धर्म ऐहिक जीवन के लिये भी है और पारमार्थिक जीवन के लिये भी।धर्म के जिस अंग का सम्बन्ध केवल पारमार्थिक जीवन से, पारमार्थिक कल्याण से है, उसी का रिलीजन, या मजहब, या अपासना पंथ, या संप्रदाय ऐसा नाम है। ये सब धर्म के अंग है। यही विश्वधर्म है। स्वामी जी कहते है एक तो कोई धर्म ही नही रहेगा और रहेगा तो वह हिन्दू धर्म ही रहेगा। गुरू रविन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि, ”यदि भारत को जानना चाहते हो तो विकेकानन्द को पढो“वे ईश्वर के करीब थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना उनकी विशिष्टता थी। स्वामी जी द्वारा दिखाये गये रास्तो पर कितने लोग अमल कर रहे है, वो जो युवा वर्ग के लिये सोचते थे वो आज की पीढी नही सोचती है।
हमें भी स्वामी जी के बताये रास्तो पर चलना होगा तभी सही मायनो मे हम उनकी जयन्ती मना पायेगें  

सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

मॉ की महिमा निराली


मॉ की महिमा निराली होती है। नवरात्र में हर तरफ उन्ही की धूम है। पूरा देश इस समय पूजा में व्यस्त है, सभी किसी न किसी तरह से मॉ को खुश करने में लगे हुए है पर अफसोस की बात यही है कि जिसकी पूजा आज सारा संसार कर रहा है उसकी अस्मत की रक्षा कोई नहीं कर पाता है। यही बिडम्बना है कि जिस मॉ ने हमें जन्म दिया उसकी रक्षा हम नहीं कर पाते है। मॉ का नाता जन्म से नहीं सासों से होता है फिर भी कोई नहीं समझ पाता है, जो मॉ को समझने का दावा करते है क्या वो मॉ की हर बात को समझ पाते है उसकी त्याग, तपस्या, बलिदान, तप यह सोचनीय विषय है मॉ को कोई नही समझ सका है। मॉ एक अहसास है, पर कोई नही जानता । मॉ शब्द से हर कोई जुडा हुया है, खुद गीले में सोकर हमें सूखे में सुलाती है।
आज जो हो रहा है वो कितना बुरा हो रहा है, मॉ की इज्जत को तार-तार किया जा रहा है जिस मॉ ने हमें जन्म दिया उसकी स्थिति खराब कर रहे है। क्या किसी ने सोचा कि अगर लडकी न हो तो क्या मॉ मिल पायेगी। मॉ के हाथ का खाना खाकर उसके गोद में सर रखकर साने का आनंद ही कुछ अलग है। बच्चे को समाज में एक मुकाम पर पहुचाती है मॉ महान होती है।
मॉ तेरे अनेको नाम
तूझे करुू मै प्रणाम,
सब दुख सहती कुछ न कहती
तुझ से शुरु होती मेरी पहचान,
तू करुणा का सागर है,
तू ही है गीता कुरान
तुझ में है रब की शान,
तुमने हमको चलना सिखाया
इस संसार से लडना सिखाया,
तेरे गुण गाये सुबह शाम
मॉ तुझे प्रणाम।



शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

क्यों कुर्बान होती है नारी

संस्कारो की भेट चढ़ती है नारी
खुशियों की दुकान की चाभी है नारी
राष्ट्र का सम्मान  है नारी
फिर नारी होती है कुर्बान
आचल में समेटे है परिवारों की खुशिया
फिर भी सहती है सबकी बाते
लोगो को ताने भी सहती है नारी
फूल जैसी होती है नारी
घर का अभियान होती है नारी
मीठी जुबान होती है नारी
सर्जन की जननी है नारी
पर सभी का पहचान होती है नारी
गरिमा का नाम है नारी
फिर क्यों कदम कदम पर होती है कुर्बान नारी
तपस्या त्याग की पहचान है नारी
फिर भी सहती है नारी
अपमान और जिल्लत सहती है नारी
तभी वो बर्दाशत करती है हर बात को
समझो न नारी को खिलौना
अपनी पर आ जाये तो दुर्गा है नारी
उसको पास होती है उम्मीद की एक दुनिया
आचल फेलाए तो ठंडी बयार है नारी
समझो न उसको  दीन  हीन 
शक्ति का अवतार है नारी
फिर क्यों कुर्बान होती है नारी

शनिवार, 7 सितंबर 2013

गुरु की महिमा

गुरु ने हमको सिखाया
सही राह पर चलना है,
गुरुवर ने दिया है ज्ञान
परोपकार,भाईचारा,मानवता,
का,
जो राह हमें दिखायी
वही हम ओरो को दिखाये
सच्चाई और सहानभूति को
आगे हम और बढ़ाये
गुरु की महिमा को
कोई न समझ पाया
कठिन डगर हो या काटो वाली
उस पर चलना सिखाया
जीवन के हर मोड़ पर
गुरु  के आदर्श जरुरी है,
न हो गुरु  जीवन में
तो जीवन अँधियारा है
माना है जग ने भगवान  से पहले
गुरु नाम तुम्हारा है,
जो राह दिखाई तुमने
उस पर चलते  जाना है,
चाहे हो काटो का सफ़र
हसकर बढ़ते जाना है
हे गुरु तुम्हे शत शत नमन   

सोमवार, 2 सितंबर 2013

मर्त्य देश के निवासी

हम जिस देश में रहते है
वो मर्त्य हो चुका  है
सब जिन्दा लाश की तरह जी रहे है
अपराध बढ़ता जा रहा  है
कोई बचाने  वाला नहीं है
हर कोई ढूँढ रहा  है
कोई बचने आ जाये
पर मरे हुए देश में कौन  आएगा
हिंसा  का है बोलबाला
राजा ही नहीं अच्छी  है
तो प्रजा का क्या होगा
भगवान का नाम लेने वाले ही
माँ बहन की इज्जत लूट रहे है
क्या होगा ऐसे देश का
रखवाला ही लूट रहा  है
कौन बचेयेगा
हम कैसे देश के निवासी है
ये सोचना होगा
 

रविवार, 1 सितंबर 2013

मानवता खो गयी

मानवता खो गयी यहाँ
हर कोई है स्वार्थ में डूबा
पैसे की चकाचोंध में
क्या बच्चा क्या बूढा
हर कोई लिप्त है माया में
जनता पिस रही है महगाई  से
ऐश कर रहे है नेता
अमीर अमीर हो रहे है
गरीब और गरीब
कोई नहीं पूछता किसी से
तुम क्यों उदास हो
क्या हुआ तुम्हे
मानवता के नाम पर सब शून्य
किसी के मरने जीने से
किसी को नहीं फर्क पड़ता
दुनिया है बढती रहेगी
क्या होगा ऐसे में
न कोई त्यौहार पर
किसी से मिलता है
मानवता का अंत हो रहा  है
यही कलयुग है
क्या कहे इसका
न कोई अंत है
न शुरुआत 

रविवार, 25 अगस्त 2013

अयोध्या का सच

क्या है अयोध्या का सच
कौन  जाने
सब मस्त है मंदिर  की धुन मे
किसको सुध आम जनता की
नेता कहते नहीं बनेगा
संत कहते बनेगा
राम जी का ठिकाना नहीं
क्या होगा राम जी का
सब अपनी रोटी सेकते  है,
अयोध्या फिर सुर्खी में है
संत मंदिर बनवा ही लेंगे
जनता जी किसी की सुध नहीं है
सब राम में मस्त है
चनाव आ गए है
अब  संतो को याद आई
की मंदिर बनना है
सब राम का मंदिर चाहते है
पर जिन के पास घर नहीं है
उनके घर कैसे बने ये
नहीं कोई सोचता
क्या होगा राम का मंदिर बना कर
जब उसके भक्तो के पास ही
रहने को छत नहीं





सोमवार, 19 अगस्त 2013

राखी का बंधन

राखी का त्यौहार
लगता है प्यारा
भाई- बहन का प्यार
होता है सच्चा
सबसे सच्चा रिश्ता
होता है भाई - बहन का
भाई करता है हर समय
बहन की रक्षा
हर साल आता है  यह त्यौहार
और लता है खुशिया अपार
सरहद पर वीर जवानो के
लिए राखी  का बंधन
होता है अपने देश के
सरहदों को बचने के लिए
राखी है पावन  पुनीत
आओ संकल्प ले हम
इस राखी पर
बचायेंगे हर बहना की लाज 

शनिवार, 17 अगस्त 2013

पत्थरों का शहर

पत्थरों  के इस शहर में
किस  से दिल  लगाऊ
हर कोई लगाये  है चहेरे
कोई नहीं लगता है अपना
 किस से दर्द बताऊ
पत्थरों के शहर में
न दिलहै न जज्बात,
हर कोई लगता है झूठा
कैसे  हाल बताऊ
सब कोई हँसते है हम पर
का से दर्द बताऊ
पत्थरों के शहर में
हर कोई हेरान है

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

ये कैसी स्वतंत्रता

 फिर आया १५ अगस्त
 क्या  लाया एक और दिन
न याद आते है शहीद
 और न  उनका बलिदान
बस याद आता है लडू
और    कुछ  नहीं
 क्या  यही रह गयी है  स्वतंत्रता
ये कैसी  स्वतंत्रता  है?
बच्चो  को क्या पता
क्या  होता है बलिदान
क्या है देश भावना
एक  दिन मना लेने  से
हो  जायेगा   ये दिन  पूरा
फिर हो जायेंगे हम गुलाम
और फिर कैसी  स्वतंत्रता
और क्या इस दिन का  काम 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सावन में प्रेम की की बूंदे

सावन में   जब गिरती है बूँद
तो  भीग जाता है  तन मन
और नाचने लगता है,
ऐसा  लगता है  हर तरफ
छाया है प्रेम  खुमार
और सभी मस्त है सावन की
  फुहारों में,
हर फूल कली  कह रही है
सावन में भीगने का मन करता है
प्यार का  अहसास होता है
सावन में
हर कोई खुश है
सावन की बूंदों में
नदी सुमंद्र  से   मिली सावन में
  बादल   मिले बादलो से
ऐसा लगा दो  प्रेमी मिल रहे
 इस  सावन में
 

सोमवार, 29 जुलाई 2013

एक युग पुरुष

था सच्चा बेटा इस धरती का
कर गया बड़े वो
जिसके आगे दुनिया झुकती
था उसका नाम विवेकानन्द
जीना उसने है सिखलाया
वरना  हम क्या क्या करते
अपने लिए  तो सब जीते है
पर जीना आये  दूसरो  काम
था नाज जिसे अपनी धरती पर
कर गया संसार  नाम वो
है सबमे साहस  मानवता का
 सिखला गया साहस का पाठ वो,
ना  जात्ती पाती न उच नीच
सब है बराबर
इस  जहा में
ऐसा पाठ  पढ़ाया  उसने
देशप्रेम की ललक उठे
सिखलाया की  कैसे हो
नए समाज का सर्जन यहाँ
काटो पर चलकर  भी उसने
कर  दिया गर्व  से नाम अमर
हे नाज हर भारतवासी को 
 क्यों न होते आब विवेकानंद
छोटी सी आयु में ही
कर गए वो नाम अमर
अब हम सबकी है बारी
कर जाये एक नए समाज का
निर्माण यहाँ

सोमवार, 8 जुलाई 2013

कौन है वो

कौन है वो जिसका है इंतजार
 खड़ा दरवाजे पर कौन
किसकी है आहट
दबे पाँव कोई आ रहा  है
हुई  थोड़ी  सी हलचल
आ गया  वो
ये तो कोई अजीब सा इन्सान है
किसे लेने  आया है
 एक सांस टूटी
और ले गया वो अजीब इन्सान
एक ज्योति
और छोड़ गया वो निर्जीव शरीर
किसके लिए
सिर्फ रोने के लिए
एक मलाल रहा
कुछ न कर पाए हम
इस जिन्दगी में
बेकार हो गया जीवन
व्यर्थ की बातो में
 अब  एक आस   आयेंगे
फिर से इस जहा में
कुछ के तो आसूं पूछ पाएंगे हम    

रविवार, 30 जून 2013

दर्द न जाने कोय

आखे नम हर तरफ तभाही का मंजर
सब बिछड़े और  समा गए
  काल  के हाथो में
अपनों का दर्द
 सहा नहीं जाता
पर भगवान की मर्जी के
आगे रहा नहीं जाता
आओ हाथ बढ़ाये
रोतो को हँसाये
बिछड़ो को मिलाये
और ले संकल्प
न करेंगे प्रक्रति से छेड़ छाड़
नहीं तो फिर एक बदल फ़टेगा
और कितनो को और ले जायेगा जायेगा
अपने संग  खुद ही दोषी है
पर खुद का दोष दिखता  नहीं    
इस काल के आगे
अपना बस चलता नहीं
मेरी यही गुजारिश है दोस्तों
इस दर्द को समझो
और बढ़ो आगे 
दो सहारा उनको
जिनका कोई नहीं
इस जहा में
हम किसी के आसू पोछ
पाए तो
समझो जीवन हुआ सार्थक
हमारा दोस्तों 
 

रविवार, 16 जून 2013

पिता जीवनदाता

 पिता होता है जीवनदाता
माँ की तरह प्यारा
माली की तरह सीचा हमको
बचाकर रखा हमें सब दुखो से
जैसे  पॊधो  को सम्हालते
वैसे पिता हमें सम्हालते
हर बात हमारी करते पूरे
अपने भूके रहकर भी वो
पेट हमारा भरते है,
दुखो की परछाई भी हम पर
न  पड़ने देते
पिता से ही बच्चो  का दुलार है
पिता से हर त्यौहार है
पिता से ही माँ का सुहाग है
पिता से ही जीवन का  संचार है
पिता नहीं तो जीवन अनाथ है
पिता भगवान के बाद दूजा नाम है
पिता नहीं तो जीवन बेकार है
पिता ही जीवन की साँस है

शुक्रवार, 14 जून 2013

शादी और मौत में समानता

शादी का ख्याब हर कोई  सजाता है,
और चाहता है बंध जाये ऐसे बंधन में
जो टूटे से भी न टूटे,
और मौत भी एक ऐसा बंधन है
जो बंधन अटूट होता है,
एक दिन सबकी खुशियों है लिए
जाना  होता है पराये घर
और जाना होता है सबको
दुखी करके भगवन के  पास
क्या समानता होती है
दुल्हन सजती है,
घर सजता है
और जब मौत होती है
तो भी सजाया जाता है
दुलहन  को उसके दुसरे घर
भेज  दिया जाता है,
और अर्थी को भी सजा कर 
भेज दिया जाता है उसके दुसरे घर
शादी में भी आसू बहते है
और मरने पर भी
कितनी समनाता है
पर एक जगह जिन्दगी शरू
होती है,
और एक जगह खत्म
सब चले जाते है आसू बहाकर
और रह जाती है बस यादे

 

मंगलवार, 11 जून 2013

सावन

सावन आया बारिश लाया
तपती गर्मी से राहत  लाया
पेड़ पॊधे सब भीग गए
और हरियाली छा गयी
सब को मिली राहत गर्मी हुई गायब
सावन की बूंदों में कितना अपनापन होता है
मन नहीं रहता बस में
मिलने को  करता है,
सुंदर  सपने आते है
सावन में,
सब होते कितने खुश
सावन में होता मन इतना प्रफुलित
हर तरफ हरियाली की चादर ओढ़े
धरती ने ओढ़ी चुनरिया
हर कोई मस्त है सावन की बूंदों में
सावन की  होती बात निराली
हर कोई डूब जाना चाहता है सावन के मौसम में

सोमवार, 10 जून 2013

राजनीति

राजनीति का खेल निराला  होता है
हर कोई इस खेल का खिलाडी होता है
हर कोई पांच साल का  गेम में मस्त
 विचार कैसे भी हो
 मकसद एक ही है
कोई  भी हो पार्टी  
सब कर रहे देश को बर्बाद
लूट मार का हो रहा व्यापर
हर तरफ हाहाकार
पांच साल बाद आते है
और झुककर करते है सलाम
और कहते है की हम सा न
कभी हुआ  न होगा
जनता  है हेरान
क्या होगा इस देश का
कोई नहीं जानता
राजनीति का खेल निराला  होता है

रविवार, 9 जून 2013

कजरारे बादल

बादल आये बादल आये
काले काले बादल आये
जब टकराते है आपस में,
तो होती है बरसात
और धरती की प्यास बुझा
देता है आकाश
जब बादल टकराते है
तो मानो दो प्रेमी एक दुसरे से बाते करते
नज़र आते है,
क्या  सुंदर नज़ारा होता है
सब तरफ खिली खिली महक होतीहै
काले बादल  एक सन्देश लाते  है
हर  तरफ बिखेरो खुशियों की चांदनी
न रहे कोई उदास
इस जमी पर
सब और बिखरी हो खुशियों की बरसात
काले बादल काले बादल
छाए है नभ के उपर




शुक्रवार, 7 जून 2013

देहज प्रथा

दुल्हन की डोली उठी
सज धज वो सुसराल चली
देहज का दानव संग् चला
जाते ही सुसराल वाले
तंग करने लगे
क्या लायी हो बहू घर से
वो बोलो  प्यार लायी हु
कहा  है पैसा और सामान
वो तो नहीं है मेरे पास
हुआ  मानवता का अंत
सब मिल करे अत्याचार
और जिन्दगी की साँस टूट गयी
एक अबला लड़की फिर रूठ गयी
रूठी अपने जीवन से
हो गया अंत
देहज का दानव खुश  हुआ
हुई उसकी जीत
हरा एक पिता बेचारा
क्या था उसका गुनाह
की एक लड़की अ जनम हुआ
उसके घर,
क्या लड़की होना गुनाह है?????????????


रविवार, 19 मई 2013

पर्यावरण

  आज समय  कह रहा है
पर्यावरण बचाओ,
पेड़ पॊधे कट रहे है
वो विच्रारे कह रहे है
मुझे मत काटो
पर कोई  सुन रहा उनकी
जब  गर्मी जयादा  पड़ती है
तो ढूंढते सब पेड़ की छाव
पर कट रहे है पेड़ हमारे
सुख  रही है नदिया  
बन रहे है पत्थरों के शहर
जब   तक रहेंगे पेड़ हमारे
मिलती रहेगी छाव  हमें
हम   जा रहे है पर्यावरण से
दूर जो देता है हमें  शीतलता
पर हम न पॊधे लगाये
तो कैसी  धरती  हमारी
ये तो सोचो जीवन है उसमे
जिसे हम काट रहे है
उसका दर्द कौन  समझे
न कह पाए कोई वो किसी से
आओ हम संकल्प ले की हमें पेड़ लगाना है
तभी  होगी धरा  सुंदर
और बचेगा पर्यावरण  


सोमवार, 13 मई 2013

गर्मी

 खिड़की  से  झाकता   सूरज
 तपती  धरती आये  पसीना
गर्मी   की  है बात  निराली
 सब  होते घरो में बंद
 और लेते आम का  मजा
ना पढने की झंझट,
ना  स्कूल जाना
सूरज  देव ने  आखे  खोली
 सबको  मिला उजाला
सब करते मिल कर धमाल
गर्मी में सब  खाते  आइसक्रीम
हर मौसम  का  अपना मजा
गर्मी हो सर्दी

मंगलवार, 26 मार्च 2013

प्यार भरी होली

होली का त्यौहार है
रंगों की भरमार है
सभी डूबे है   मस्ती में
होली है भाई होली है,
बीच  सड़क में  टोली है
सब झूम  रहे है
खाके भांग,
 क्या बच्चे क्या बूढ़े
सब डूबे है रंगों में
क्या  नेता  क्या अभिनेता
हर तरफ है प्यार का रंग
नफरत की कही जगह नहीं,
ये होली का त्यौहार ऐसे ही
बिखेरता रहे अपना प्यार का रंग 

मंगलवार, 12 मार्च 2013

होली

होली   आई खुशिया लायी,
 चहकी चिड़िया डालो पर,
 हर  तरफ  है खुशबू  पकवानों की
सभी है मस्ती में  चूर
होली आई होली आई,
रंगों  में डूबा संसार
हर तरफ है प्यार  का रंग
सबके चेहरे लगते रंगीन,
 इतने पावन पर्व पर भी
क्यों नफरत का रंग लगाते
क्यों खेलते खून की होली
रंगों के इस त्यौहार को
क्यों करते है बदनाम
मस्ती में  खेलो होली
रंग लगाओ गुझिया खाओ
सब मिल ये त्यौहार मनाओ
आई रे होली आई रे होली

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

नदी

नदी  बहती है 
दो किनारे को 
नहीं छू पाते दोनों किनारे 
 बहते रहते है,
नदी का काम  है बहना 
शांत तरीके से 
नदी और जीवन कितनी सामान   है 
जीवन भी इसी तरह बहता है 
कितने भी तूफ़ान आ जाये 
बस लड़ता रहता है 
जैसे नदी में तूफ़ान आ जाते है 
फिर भी वो बहती रहती है 
तूफानों से लड़कर 
उसी तरह जिन्दगी है 
हर तूफ़ान का सामना करती है 
हिम्मत नहीं हारती है 
 नदी से सीखना  होगा हमें 
की हिम्मत नहीं हराना कभी 
चाहे जो भी हो जाये 
नदी की तरह शांत से बहते रहना है 

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

नारी तुझे प्रणाम

जीवन भर  सहती सजा
यही तेरी है व्यथा
नहीं तेरे मन में  कोई   पाप
करती  तू सबको माफ़
तेरा जीवन सागर से महान,
   चलते  रहना  तेरा काम  
  घर  को  तुम स्वर्ग बनाती
रिश्तो को भी तुम  सजाती
जैसे हो दिया की बाती
पर फिर भी क्यों समझ  नहीं पाते
तेरी को क्यों अबला बताते
तो है जननी तू है महान
खुद को भुलाकर जीती है
सबके खुश  में खुश होती है
अपने दर्द छुपाती  है
फिर भी क्यों नहीं समझ पाते
नारी की महानता को
ऐसी नारी को मेरा प्रणाम 

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

वैलेंटाइन दिवस

फिजा का रंग बदलने लगा है
हर तरफ प्यार का रंग छाने लगा है,
सब पर छाया है प्यार  का खुमार
हर कोई है  बेक़रार 
 करने को इज़हार
अपने प्यार का
पर प्यार क्या प्रेमी प्रमिका का
ही होता है
प्यार का इज़हार तो हम कर सकते है
अपने माँ पिता जी  से,
अपने भाई बहन से
अपने गुरु से
किसी से भी
क्या वैलेंटाइन का मतलब
प्रेमी प्रेमिका  का प्यार ही होता है,
अगर इस बार सब ये संकल्प ले
की वैलेंटाइन दिवस पर हम
करेंगे अपने देश से प्यार
तो होगा इस दिन का सम्मान


शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

वक़्त नहीं है

  पत्नी  का  गाना  सुन   सकते  है ,    
माँ   की लोरी  सुनने का   वक़्त नहीं है
मोबाइल पर  बाते कर    सकते है
दोस्तों के लिए वक़्त नहीं है,
सारा दिन घूम सकते है
पर पिताजी के लिए वक़्त नहीं,
सिनेमा  देख सकते है
पर पढने के लिए वक़्त नहीं,
ऑफिस  में गप मार सकते है
पर काम  के लिए वक़्त नहीं,
बहस कहो तो   कर सकते है 
पर समाधान के लिए वक़्त नहीं,
दूसरो की गलती निकल सकते है
पर अपनी गलती ढूँढने के लिए वक़्त नहीं,
कब आएगा वो वक़्त  हम कर पाएंगे
सारा काम
ये भी बटने के लिए हमारे पास वक़्त नहीं

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

मेरा मन

मेरा मन करता है कि
आसमान में उड़ जाऊ,
हाथ से छुकर नन्ही नन्ही
कलियों को,
जो खिलना चाहती है
 उनको  लेकर उड़ जाऊ
नन्ही नन्ही बूंदों को
समेट कर पानी का
सुमंदर बनाऊ
और उसमे कागज की नाव चलाऊ
मेरा मन करे की आसमान से तारे
तोड़कर एक छोटा सा घर बनाऊ
पर क्या ये संभव है?
मेरा मन करे की पानी के साथ
खेलू,
और मन करे की उड़ जाऊ आसमान में
पर ये एक कल्पना है
 ऐसा होता   नहीं है
मेरा मन करे

बुधवार, 30 जनवरी 2013

कंकड़

कंकड़ का क्या अस्तिव
एक छोटा सा टुकड़ा
जो घर पर मारो तो काच टूट जाये
बने तो घर की नीव बन जाये
जितना छोटा कंकड़
उतने उसके फायदे
प्रेमी इसका उपयोग प्रमिका को जागने में करते
बच्चे नदी में मारते,
जब मारते तो नदी में होती है हलचल
तो बच्चे होते है खुश
कंकड़ क्या होता है
इतना छोटा सा कड
क्या क्या कमाल दिखाता है
प्रेमी के लिए है वरदान
कंकड़ न होता तो क्या
होता
दुनिया होती कितनी  वीरान
कंकड़ है कितना छोटा सा
पर काम  करता कितने महान 

फिर छाया बसंत

सजी धरती आज फिर
पीली चुनरिया ओढ़कर,
हर तरफ छाई  है फूलो की महक
हर कोई खुश  है
आम की बोर देखकर
सूरज ने भी आखे खोली
सरसों भी फूली हुई है चारो और
आया सखी फिर से बसंत
कोयल की कूक है चारो ओर,
सब कुछ लगता कितना नया
फागुन खड़ा है  दरवाजे पर
सब पर है मस्ती छाई
और छाई है माँ सरस्वती  की
आराधना की  धूम
हर कोई नाच रहा है
ठण्ड से मिली राहत
आया सखी फिर से बसंत

शनिवार, 26 जनवरी 2013

सिर उचा रहे देश का

 शान न भारत की घटने पाए
हम भारत के बेटे है,
जान दे देंगे हम
पर देश पर आच न आने देंगे
64  साल बीत गए
आओ सोचे क्या खोया हमने
और कहा पर हम  आये
64 साल  बाद भी हम
मानसिक  रूप से   गुलाम रहे
हम अब भी देश से न  जुड़ पाए
तो हम क्या कर पाएंगे
केवल बुराई करके,
हम अपने फ़र्ज़ से
क्या हम सोचो बच  पाएंगे
आज फिर से  विचार करे हम
क्या खोया क्या पाया है
कितना हम देश से जुड़ रहे
और कितना हम  भाग रहे
आज फिर वो समय आ गया
जब हम फिर से  संकल्प ले
की भारत की शान  खोने न देंगे
  


गुरुवार, 24 जनवरी 2013

नारी


नारी  हू   में
मुझमे  है छमता,
फिर  क्यों समझते है
कमजोर  मुझे,
 मैंने सबको चलना सिखाया,
 सब कुछ भूल किया सब  अर्पण
फिर भी क्यों हू में अबला
सहनशक्ति है मेरे अंदर
दुर्गा का रूप हू
फिर भी क्यों नहीं मानते
सब  क्यों कहते है नारी तो
बर्बादी है
नारी न होती तो ये दुनिया न
होती
ये क्यों नहीं मानते है
आज हर जगह बदनाम हो  रही
क्यों सब  ऐसा काम कर रहे
मेरे अंदर भी है एक जान
ये  क्यों नहीं जानते
   

शनिवार, 19 जनवरी 2013

प्रेम


प्रेम  शब्द  है  या  विस्बास
क्या है प्रेम?
 प्रेम  अनछुआ सा  अहसास है
   जो महसूस किया जाता है
  प्रेम को कोई नहीं समझ सका है,
प्रेम  था   राधा का
 ऐसा प्रेम कहा मिलता है,
प्रेम सावन की  बूंदे है
प्रेम बहती नदी है
 प्रेम हर  एक  जगह  में है
फिर भी  लोग लड़ते है
क्यों?
 अगर सब यही समझ  ले तो  
नफरत के लिए जगह ही न  रहे,
प्रेम हो हर तरफ तो
दुनिया  कितनी अच्छी हो