मंगलवार, 3 जनवरी 2012

बज गयी चुनाव की घंटी
सब नेता लुभाने लगे जनता को
क्या होगा परिणाम ये कोई नहीं जानता
पर सभी लगे है जानता को अपनी और 
लुभाने में
जनता भी जानती है इनके वायदे
फिर भी आ जाती है इनके वायदों में
जनता का न रखते  ये ख्याल
वो तो अपनी जेब सिलाते
जनता रोये या मरे
उन्हें कोई ख्याल नहीं
वो सेकते  अपनी राजनीती की रोटिया
कोई पार्टी हो या या कोई नेता
सब एक ही तरह है
ऐसा मुखिया हो तो क्या कहना
क्या करे जनता और क्या करे नेता
 









 
 




 

2 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत बढ़िया :)

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........